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इंदौर जोन-3 में बिना मीडिया के हो गई प्रेस कॉन्फ्रेंस: निजी मोबाइल से की रिकॉर्डिंग; पुलिस अधिकारियों के रवैये को लेकर उठे सवाल

इंदौर। जोन-3 में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस अपने मुद्दे से ज्यादा मीडिया की गैरमौजूदगी को लेकर चर्चा में है। प्रेस वार्ता में न पत्रकार नजर आए, न न्यूज चैनलों के कैमरे और न ही मीडिया के माइक। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब प्रेस ही मौजूद नहीं थी, तो आखिर यह प्रेस कॉन्फ्रेंस किसके लिए और किससे संवाद के लिए आयोजित की गई थी।

चर्चा यह भी है कि कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के लिए निजी मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया गया। इस पूरे मामले पर अभी आधिकारिक तौर पर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है। जोन-3 के DCP अभिषेक रंजन से जुड़ी इस घटना ने पुलिस और मीडिया के बीच संवाद, पारदर्शिता और अधिकारियों के मीडिया से व्यवहार को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

पत्रकार नहीं थे तो किसके लिए हुई प्रेस वार्ता?
इस मामले में इंदौर पुलिस के जोन-3 से जुड़ा बताया जा रहा है कि जोन-3 के DCP अभिषेक रंजन की प्रेस वार्ता में पत्रकारों की गैरमौजूदगी को लेकर मीडिया जगत में चर्चा शुरू हो गई है। जब मीडिया ही नहीं थी तो प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई कैसे?

मीडिया से संवाद कमजोर होने पर सवाल
इंदौर की मीडिया लंबे समय से पुलिस, प्रशासन और शहर से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाती रही है। अपराध से लेकर कानून-व्यवस्था, जनसमस्याओं और प्रशासनिक फैसलों तक पत्रकार लगातार अधिकारियों से सवाल- जवाब करते रहते है, और कई अन्य मुद्दों को लेकर इंदौर मीडिया हमेशा एक्टिव रहा है।

ऐसे में किसी जिम्मेदार अधिकारी और मीडिया के बीच संवाद कमजोर होने की स्थिति को केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं माना जा सकता। पुलिस की कार्रवाई और उपलब्धियों की जानकारी जनता तक पहुंचाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

पत्रकार केवल कैमरा लेकर खड़े रहने वाले लोग नहीं होते। वे आम लोगों की ओर से सवाल पूछते हैं, कार्रवाई की जानकारी लेते हैं और जरूरत पड़ने पर व्यवस्था की कमियां भी सामने रखते हैं।

‘अधिकारी अपनी सुविधा से संवाद करेंगे’ तो सवाल कौन पूछेगा?
विभागीय स्तर पर यह तर्क भी सामने आता रहा है कि अधिकारी को यह तय करने का अधिकार है कि वह कब और किससे संवाद करे। प्रोटोकॉल और प्रशासनिक अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल यह है कि सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में संवाद की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी होनी चाहिए?

पुलिस की जिम्मेदारी केवल अपराधियों पर कार्रवाई करने तक सीमित नहीं है। कानून-व्यवस्था की स्थिति, बड़ी कार्रवाई, पुलिस की उपलब्धियां और आम लोगों से जुड़े महत्वपूर्ण मामलों की जानकारी जनता तक पहुंचाना भी उसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

ऐसे में पुलिस और मीडिया के बीच नियमित संवाद कमजोर होने पर उसका असर आखिरकार जनता तक पहुंचने वाली सूचना पर ही पड़ता है।

उपलब्धियों के समय मीडिया जरूरी, सवालों के समय दूरी क्यों?
पुलिस की बड़ी कार्रवाई होने पर अखबारों में खबरें प्रकाशित होती हैं, न्यूज चैनलों पर कवरेज होती है और डिजिटल मीडिया के जरिए जानकारी हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचती है।

वजह है कि मीडिया के साथ संवाद को लेकर एक सवाल बार-बार उठ रहा है, जब पुलिस की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के लिए मीडिया जरूरी है, तो सवाल पूछे जाने के समय दूरी क्यों?

यदि मीडिया की भूमिका ही महत्वपूर्ण नहीं मानी जाती, तो फिर अखबारों की कटिंग, न्यूज चैनलों की क्लिपिंग और मीडिया कवरेज के जरिए विभागीय उपलब्धियों को वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाने की व्यवस्था पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

इंदौर में पहले भी मीडिया और अधिकारियों के बीच विवाद रहे
इंदौर में मीडिया और अधिकारियों के बीच मतभेद का यह पहला मामला नहीं है। कोविड काल में मास्क से जुड़े विवाद के दौरान तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को लेकर इंदौर की मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया सामने आई थी।

इसी तरह आईजी अनुराधा शंकर से जुड़े मीडिया के माइक हटाने के मामले ने भी सुर्खियां बटोरी थीं। जोन-1 में पदस्थ रहे आईपीएस विनोद मीना के कार्यकाल के दौरान पत्रकारों के नंबर ब्लॉक करने और मीडिया से कथित व्यवहार को लेकर भी विवाद की चर्चा हुई थी। इन पुराने मामलों के बीच जोन-3 की मौजूदा घटना ने एक बार फिर पुलिस और मीडिया के रिश्तों को लेकर बहस छेड़ दी है।

अधिकारी के रवैये का असर पूरे विभाग की छवि पर क्यों?
इंदौर की मीडिया ने पुलिस की सफलताओं को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया है। अपराधियों की गिरफ्तारी, बड़ी बरामदगी, नशे के खिलाफ कार्रवाई और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में पुलिस की उपलब्धियां लगातार खबरों का हिस्सा रही हैं। ऐसे में सवाल किसी एक अधिकारी की व्यक्तिगत पसंद या नाराजगी से आगे बढ़कर विभागीय संवाद व्यवस्था पर खड़ा होता है।

यदि किसी अधिकारी और मीडिया के बीच मतभेद हैं तो उनका समाधान संवाद से होना चाहिए, दूरी से नहीं। क्योंकि अधिकारी बदलते रहते हैं, लेकिन पुलिस विभाग और जनता के बीच भरोसा बनाए रखने की जिम्मेदारी स्थायी होती है।

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