आज से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम होगी मुसाफिर कैफ़े, जानिए दर्शकों का दिल जीतने में कितनी हुई सफल
दिव्य प्रकाश दुबे के प्रसिद्द नॉवेल मुसाफिर कैफ़े और बनी सीरीज आज से नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीम हो रही है। सीरीज रिलीज़ होते ही इसका रिव्यु भी सामने आ गया है। आइए जानते है कि किताबों से निकलकर ओटीटी पर आई यह कहानी दर्शकों को लुभाने में कामयाब हुई या नहीं।
धीमी पर जोड़े रखने वाली कहानी
सीरीज की पूरी कहानी चंदर (विक्रांत मैसी), सुधा (वेदिका पिंटो) और प्रीति (महिमा मकवाना) के इर्द-गिर्द घूमती है। सीरीज की कहानी दो टाइमलाइन में चलती है। एक तरफ चंदर और सुधा का अतीत है, जहां दोनों की मुलाकात अरेंज मैरिज के जरिए होती है। चंदर अमेरिका से लौटा एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, लेकिन उसका सपना कॉर्पोरेट नौकरी नहीं, बल्कि पहाड़ों में अपना छोटा-सा कैफे खोलने का है। वहीं, सुधा एक महत्वाकांक्षी वकील है, जो भोपाल से निकलकर मुंबई हाईकोर्ट में अपना करियर बनाना चाहती है। दोनों एक-दूसरे के करीब आते हैं, लेकिन उनके सपने और जिंदगी को लेकर सोच बिल्कुल अलग है। दूसरी तरफ, वर्तमान में कहानी मसूरी के ‘मुसाफिर कैफे’ की है।
लॉकडाउन के दौरान चंदर की मुलाकात प्रीति से हुई थी। प्रीति एक सोलो ट्रैवलर और ट्रैवल ब्लॉग लिखने वाली लड़की है। वह चंदर के पहाड़ों में कैफे खोलने के सपने को अपना बना लेती है और दोनों मिलकर ‘मुसाफिर कैफे’ की शुरुआत करते हैं। दोनों टाइमलाइन साथ-साथ चलती हैं और यही सीरीज की सबसे बड़ी ताकत है। हर एपिसोड के साथ ऑडियंस के मन में यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है कि आखिर चंदर और सुधा के रिश्ते में ऐसा क्या हुआ कि दोनों की राहें अलग हो गईं। अच्छी बात यह है कि मेकर्स कहानी को आखिर तक प्रिडिक्टेबल नहीं बनने देते और अंत में दूसरे सीजन की भी गुंजाइश छोड़ते हैं।
हर किरदार अपने आप में ख़ास
बात की जाए कलाकारों की तो सीरीज में विक्रांत मेसी, वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना मुख्य भूमिका में दिखाई दिए है। तीनों अपने-अपने किरदार में जाँच रहे है। सभी ने अपने किरदार को समझकर उसे बखूबी स्क्रीन और पेश किया है। चन्दर के किरदार में विक्रांत दिल जीत लेता है। इस किरदार की ईमानदारी और सहजता को उन्होंने बखूबी निभाया है। महिमा मकवाना को स्क्रीन स्पेस काफी कम मिला है लेकिन कम समय में भी वह अपनी दमदार चाप छोड़ती है। वेदिका ने सुधा चन्दर की केमिस्ट्री के साथ ही अपने किरदार के चुलबुलेपन को बखूबी पेश किया है लेकिन कई जगह उनका जरूरत से ज्यादा अभिनय आपको निराश कर सकता है।
रोमांटिक-ड्रामा देखने वालो के लिए बेस्ट ऑप्शन
निर्देशक रुचिर अरुण ने कहानी के साथ पूरा न्याय किया है। अक्सर किताबो से स्क्रीन तक का सफर तय करने में कहानी अपनी आत्मा खो देती है लेकिन रुचिर ने इसकी सादगी को बनाए रखा। मसूरी और भोपाल की खूबसूरत लोकेशंस कहानी को और खूबसूरत बनाती हैं। बैकग्राउंड म्यूजिक कई जगह खामोशी को और असरदार बना देता है। इस वजह से इमोशनल सीन बिना ज्यादा डायलॉग के भी असर छोड़ते हैं। स्क्रीनप्ले की सबसे अच्छी बात इसकी दो समानांतर कहानियां हैं, जो ऑडियंस की दिलचस्पी बनाए रखती हैं। शुरू के कुछ एपिसोड धीमे लगते है लेकिन फिर आप कहानी के साथ ऐसे जुड़ जाते है कि उससे निकलना मुश्किल हो जाता है। कुल मिलाकर मुसाफिर कैफ़े आपके वीकेंड के लिए एक सुकून भरा विक्लप बन सकती है।