28,500 किताबें, 4 हजार सदस्य.. लाइब्रेरी को नेहरू पार्क शिफ्ट किया; पाठकों के लिए सुविधाएं नहीं बढ़ाई

वंश शर्मा। इंदौर। आज हिंदी दिवस मनाया जा रहा है। हर ओर किताबों और हिंदी साहित्य की बात हो रही है। इसी बीच इंदौर की महात्मा गांधी पुस्तकालय की तस्वीर कुछ अलग कहानी बयां करती है।
बाहर से पुस्तकालय का भवन भले ही सुंदर और व्यवस्थित नजर आता हो, लेकिन अंदर पहुंचते ही इसकी जर्जर हालत सामने आ जाती है। करीब 28,500 किताबों का संग्रह और 4 हजार सदस्य होने के बावजूद लाइब्रेरी की सुविधाएं आज भी पुरानी हैं।
वर्ष 1998 में लाइब्रेरी गांधी हॉल से नेहरू पार्क शिफ्ट हो गई, लेकिन यहां पाठकों के लिए बैठने की व्यवस्था और अन्य सुविधाएं मानो वहीं पुरानी रह गईं।
पाठकों के लिए सुविधाएं अपग्रेड क्यों नहीं हुई
लाइब्रेरी में कई अलमारियों के कांच टूटे हुए हैं। रखरखाव का जिम्मेदार कौन? वहीं, पाठकों के बैठकर पढ़ने के लिए बेहतर व्यवस्था नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब लाइब्रेरी को नई जगह पर शिफ्ट किया गया लेकिन उसके साथ पाठकों के लिए सुविधाएं अपग्रेड नहीं की गई।
136 रुपए में सदस्यता, लेकिन सुविधाएं नहीं
कम शुल्क के कारण यह लाइब्रेरी आम लोगों और विद्यार्थियों के लिए काफी किफायती है। लेकिन इतनी सस्ती सदस्यता के साथ पाठकों को पढ़ने के लिए पर्याप्त सुविधाएं नहीं मिल रही है।

टूटे कांच में सजी है 28,500 किताबें
लाइब्रेरी में करीब 28,500 किताबें हैं, जिनमें कई पुरानी पुस्तकें हैं। लेकिन पुस्तकों को सुरक्षित रखने वाली अलमारियाँ आज भी पुरानी और जर्जर स्थिति में हैं। कई अलमारियों के कांच टूटे हुए हैं। किताबों के रखरखाव पर भी कोई ध्यान नहीं। पुस्तकालय में बैठकर पढ़ने के लिए भी ठीक व्यवस्था नहीं है। इस लिए कई पाठक यहां आते है अपनी पसंद की किताब इश्यू करवाते हैं और फिर वहां से चले जाते हैं।

पुस्तकालय का बेहतर रखरखाव जरूरी
ऐसे समय में जब युवाओं को मोबाइल और डिजिटल कंटेंट से दूर कर किताबों की ओर आकर्षित करने की जरूरत है, पुस्तकालय का बेहतर रखरखाव, सुरक्षित अलमारियां और पढ़ने के लिए व्यवस्थित एवं सुविधाजनक माहौल बेहद जरूरी है।
888 किताबों का डोनेशन
पुस्तकालय में डोनेशन बॉक्स भी रखा गया है, जहां शहर के लोग अपनी पुरानी और उपयोगी किताबें दान करते हैं। अब तक करीब 888 किताबें डोनेशन के जरिए जमा हो चुकी हैं, जिन्हें जरूरतमंद पाठक ले जाते हैं। यह आंकड़ा बताता है कि शहर में आज भी किताबों के प्रति लोगों की रुचि और जुड़ाव कायम है।

पाठकों को सुविधाजनक माहौल देना जरूरी
हालांकि, इस रुचि को और बढ़ाने के लिए पुस्तकालय की मूलभूत सुविधाओं और रखरखाव पर भी ध्यान देना जरूरी है। जब लोग अपनी किताबें दान कर रहे हैं और पाठक उन्हें लेने के लिए आ रहे हैं, तो पुस्तकालय को ऐसा बेहतर और सुविधाजनक माहौल भी देना चाहिए, जहां लोग किताब लेकर सिर्फ लौटें नहीं, बल्कि बैठकर पढ़े भी।
1998 में बदल गई थी जगह
महात्मा गांधी पुस्तकालय का स्थान वर्ष 1998 में बदल गया, लेकिन आज भी यहां की कई व्यवस्थाएं पुराने दौर की नजर आती हैं। नगर निगम के अधीन संचालित इस पुस्तकालय को अगर नई पीढ़ी से जोड़ना है तो सिर्फ किताबों का संग्रह बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। पाठकों के लिए बेहतर बैठने की व्यवस्था, किताबों की सुरक्षित अलमारियां, साफ-सफाई और आधुनिक अध्ययन सुविधाएं भी जरूरी हैं।
सभी के लिए ओपन लाइब्रेरी
संदीप पाटोदी, प्रभारी लाइब्रेरीयन ने कहा कि यह लाइब्रेरी सभी के लिए है। कोई भी यहां आकर किताबें पढ़ सका है। सभी के लिए ओपन लाइब्रेरी है।