SIR पर 2 चुनाव आयुक्तों की 14 बार आपत्ति: आयोग बोला- फैसले सर्वसम्मति से हुए; राहुल गांधी बोले- वोट चोरी संविधान पर हमला

नई दिल्ली। चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर आयोग के भीतर मतभेद की रिपोर्ट सामने आई है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीने में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई। दोनों ने कुछ मामलों में फैसले उनकी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए।
विवाद के बीच चुनाव आयोग ने कहा है कि चुनाव आयुक्तों की लिखित टिप्पणियां, सुझाव और आंतरिक स्तर पर फैसलों की जांच सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं। SIR समेत आयोग के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
ये आपत्तियां 28 अक्टूबर 2025 से 14 अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गईं। इनमें 16 अप्रैल को एक ही दिन चार आपत्तियां दर्ज की गई थीं। इन टिप्पणियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
किन मुद्दों पर उठे सवाल?
दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने, चुनावी डेटा तक पहुंच और SIR से जुड़े कुछ फैसलों से संबंधित थीं।
चुनाव आयुक्तों ने नए मतदाताओं के आवेदन से जुड़े Form-6 में किए गए बदलाव पर भी सवाल उठाए। इसके अलावा मतदाता सूची के डिजिटल डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी चिंता जताई गई।
एक अन्य मामले में पश्चिम बंगाल SIR के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम से जुड़े मामलों में आयोग की ओर से दायर अपील की प्रक्रिया पर सवाल उठाया गया।
गोवा में भी सॉफ्टवेयर से जुड़ी एक समस्या का जिक्र रिपोर्ट में है। 97 मतदाताओं को स्थानीय अधिकारियों ने दस्तावेजों के आधार पर पात्र पाया था, लेकिन सॉफ्टवेयर में उनकी स्थिति बदलने का विकल्प समय पर उपलब्ध नहीं कराया जा सका और उनके नाम अंतिम मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
राहुल गांधी बोले- समय आने पर कार्रवाई होगी
SIR को लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि वोट चोरी संविधान पर हमला है। राहुल ने चुनाव आयोग और चुनाव अधिकारियों को लेकर कहा कि समय आने पर कार्रवाई की जाएगी। उनके बयान का संदर्भ SIR और मतदाता सूची से जुड़े विवाद से था।

विपक्षी नेताओं ने भी उठाए सवाल
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठाए और सुप्रीम कोर्ट से मामले का संज्ञान लेने की मांग की।
AAP नेताओं ने भी मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं। पश्चिम बंगाल में SIR को लेकर TMC नेताओं ने भी चुनाव आयोग की भूमिका पर आपत्ति जताई है।
इन नेताओं के आरोपों पर चुनाव आयोग का कहना है कि आयोग के फैसले निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत लिए जाते हैं।
SIR में अब तक क्या हुआ?
SIR की शुरुआत बिहार से जून 2025 में हुई थी। इसके बाद 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटाए गए हैं।
पश्चिम बंगाल में SIR के दौरान हटाए गए 27.16 लाख नामों में से 22 लाख से ज्यादा मतदाताओं ने नाम बहाल कराने के लिए अपील की है। चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कुल 38.31 लाख अपीलें दायर हुई हैं।
दिल्ली SIR पर सुप्रीम कोर्ट में भी सवाल
दिल्ली में SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने भी 22 सितंबर को मतदाताओं को भेजे गए ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ नोटिस पर सवाल उठाए। कोर्ट ने नोटिस जारी करने की प्रक्रिया और उसके आधार को लेकर चुनाव आयोग से जवाब मांगा है। कोर्ट ने यह भी सुझाव दिया कि मतदाताओं को WhatsApp और ईमेल जैसे माध्यमों से जवाब देने की सुविधा दी जा सकती है।
तीसरे फेज में 16 राज्य और 3 केंद्र शासित प्रदेश
चुनाव आयोग ने SIR के तीसरे फेज में 16 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया है। इस प्रक्रिया में करोड़ों मतदाताओं के रिकॉर्ड का वेरिफिकेशन किया जा रहा है।
SIR को लेकर अब मुख्य सवाल मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने की प्रक्रिया, डेटा तक पहुंच और आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़े हैं। चुनाव आयोग के अनुसार उसके फैसलों में किसी तरह का आंतरिक मतभेद नहीं है और सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए हैं।