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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला; MP लोकायुक्त SPE अब RTI के दायरे में, 2011 की अधिसूचना रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को बड़ा झटका देते हुए SPE लोकायुक्त को RTI के दायरे से बाहर रखने वाली 2011 की अधिसूचना को रद्द कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली एजेंसी को ‘खुफिया या सुरक्षा संगठन’ मानकर सूचना के अधिकार से महफूज नहीं रखा जा सकता। सूचना के अधिकार (RTI) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। देश की शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार की उस अधिसूचना को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसके तहत स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (SPE) लोकायुक्त को RTI के दायरे से बाहर कर दिया गया था।

अदालत ने सरकार के इस कदम को अवैध मानते हुए साफ कहा कि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्थाओं को इस तरह की छूट नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए बेहद तीखी टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि मध्य प्रदेश की स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (SPE) मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 और भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत दर्ज अपराधों की जांच करती है। ऐसे में इसे RTI अधिनियम की धारा 24(4) के तहत आने वाले “खुफिया एवं सुरक्षा संगठन” की श्रेणी में कतई नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस अधिसूचना के जरिए अधिनियम में तय सीमाओं से परे जाकर छूट देने की कोशिश की थी, जो कि कानूनन पूरी तरह गलत है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले पर लगी मुहर

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के 20 दिसंबर 2021 के फैसले को सही ठहराते हुए उसे बरकरार रखा है। दरअसल, राज्य सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। शीर्ष अदालत ने अब राज्य सरकार की इस अपील को खारिज कर दिया है और मामले से जुड़ी सभी लंबित अर्जियों को भी निपटा दिया है। अदालत के इस फैसले के बाद अब मध्य प्रदेश लोकायुक्त (SPE) में पारदर्शी तरीके से RTI के तहत जानकारियां मांगी जाएगी। हालांकि, इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक तकनीकी पहलू को भी साफ किया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि उसने इस अधिसूचना की वैधता का परीक्षण केवल SPE लोकायुक्त के संदर्भ में किया है, ‘राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो’ (EOW) के संदर्भ में नहीं। इसका मतलब यह है कि यह अधिसूचना फिलहाल आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो पर लागू रहेगी और उसे इस फैसले से फौरी तौर पर अलग रखा गया है।

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