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दतिया उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने से भाजपा में बगावत, विरोध-इस्तीफों ने बढ़ाई संगठन की चुनावी चुनौती

दतिया विधानसभा उपचुनाव में नरोत्तम मिश्रा का टिकिट कटने के बाद भाजपा में भागवत का शोर खुलकर दिख रहा है। इस्तीफों की ख़बरों ने संगठन की चुनावी चुनौती बढ़ा दी है। पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का टिकट कटने के बाद समर्थकों का विरोध सड़कों तक पहुंच गया। दतिया-झांसी हाईवे पर लंबा जाम लगा, नारेबाजी हुई और कई पदाधिकारियों के इस्तीफे की खबरों ने संगठन की चिंता बढ़ा दी।

टिकट बदलते ही सड़कों पर उतरा विरोध

भाजपा की उम्मीदवार सूची जारी होते ही दतिया का राजनीतिक माहौल गरमा गया। डॉ. नरोत्तम मिश्रा के समर्थक बड़ी संख्या में सड़क पर उतर आए और दतिया-झांसी हाईवे पर धरना देकर यातायात रोक दिया। करीब तीन किलोमीटर तक वाहनों की कतार लगने से आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा।

नारेबाजी से बढ़ा राजनीतिक संदेश

प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने ‘नरोत्तम मिश्रा जिंदाबाद’, “टिकट बदलो’ और ‘आशुतोष वापस जाओ जैसे नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि दतिया में भाजपा की पहचान नरोत्तम मिश्रा के नेतृत्व से बनी और टिकट बदलने का फैसला स्थानीय कार्यकर्ताओं की भावना के विपरीत है। आशुतोष तिवारी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आते हैं। वे भोपाल-सागर संभाग में संगठन मंत्री रह चुके हैं और भाजपा सरकार के दौरान मध्य प्रदेश गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष भी रहे। उन्हें संगठन का अनुभवी चेहरा माना जाता है।

नरोत्तम मिश्रा के समर्थकों में निराशा

सूत्रों के अनुसार, टिकट की उम्मीद में डॉ. नरोत्तम मिश्रा चुनावी तैयारियों में सक्रिय थे। ऐसे में अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने के फैसले ने उनके समर्थकों को बड़ा झटका दिया। इसी वजह से विरोध का स्वर और तेज होता दिखाई दिया।

उपचुनाव से पहले भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती

दतिया उपचुनाव अब केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच का मुकाबला नहीं रह गया है। भाजपा के सामने अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी को संभालना भी बड़ी चुनौती बन गई है। यदि संगठन असंतोष को समय रहते नियंत्रित कर लेता है तो चुनावी नुकसान सीमित रह सकता है, लेकिन यदि विरोध लंबा चला तो विपक्ष इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश करेगा। दतिया की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा मुद्दा उम्मीदवार नहीं, बल्कि भाजपा के भीतर उभरा असंतोष है। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि संगठन अपने फैसले पर मजबूती से कायम रहता है या कार्यकर्ताओं की नाराजगी कम करने के लिए कोई नई रणनीति अपनाता है।

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