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UCC के विरोध में मुस्लिम समाज का प्रदर्शन: राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन; बोले- धार्मिक अधिकारों की रक्षा हो

बड़वानी। समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक-2026 के विरोध में बुधवार को बड़वानी में मुस्लिम समाज के लोगों ने प्रदर्शन किया। बड़ी संख्या में समाजजन कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और राष्ट्रपति के नाम नायब तहसीलदार सोनू गोयल को ज्ञापन सौंपा। समाजजनों ने विधेयक को संविधान की मूल भावना के विपरीत बताते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों की रक्षा की मांग की।

अनुच्छेद 44 का दिया हवाला
ज्ञापन में कहा गया कि 21 जुलाई 2026 को विधानसभा से पारित किया गया यह विधेयक संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। समाजजनों ने कहा कि संविधान सभा ने अनुच्छेद 44 को नीति निदेशक तत्वों में रखा था, मौलिक अधिकारों में नहीं।

उन्होंने डॉ. बीआर अंबेडकर के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता को समाज की सहमति और स्वैच्छिक आधार पर लागू करने की बात कही गई थी।

निकाह और विवाह के प्रावधानों पर आपत्ति
मुस्लिम समाज ने विधेयक की कई धाराओं पर आपत्ति जताई। ज्ञापन में कहा गया कि निकाह को केवल औपचारिक रस्म मानना, विवाह का 60 दिन के भीतर पंजीकरण अनिवार्य करना, फर्स्ट कजिन विवाह पर रोक और एक विवाह की अनिवार्यता मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुरूप नहीं है।

समाजजनों ने बहुविवाह को अमान्य करने और तलाक के लिए केवल अदालत की डिक्री को जरूरी किए जाने के प्रावधानों पर भी विरोध जताया।

उत्तराधिकार के नियमों पर भी जताई आपत्ति
ज्ञापन में उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए। समाजजनों का कहना है कि विधेयक में उत्तराधिकार के नियम हिंदू उत्तराधिकार कानून के आधार पर रखे गए हैं, जबकि मुस्लिम समाज में विरासत के अलग धार्मिक नियम हैं। वसीयत में एक-तिहाई की सीमा हटाने को भी धार्मिक मान्यताओं में हस्तक्षेप बताया गया।

धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा की मांग
समाजजनों ने अनुसूचित जनजाति वर्ग को विधेयक से छूट देने और अन्य समुदायों पर इसके प्रावधान लागू करने को संविधान के अनुच्छेद 14 के समानता के अधिकार के खिलाफ बताया। उन्होंने अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत मिले धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण की मांग की।

ज्ञापन में कहा गया कि देश की विविधता और सभी समुदायों की धार्मिक पहचान का सम्मान किया जाना चाहिए। किसी भी कानून के जरिए किसी समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित नहीं होनी चाहिए।

 

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