पैर काटे गए, संकल्प नहीं टूटा: सदानंदन मास्टर बोले-हमला शरीर पर हुआ; विचारों पर नहीं

इंदौर। राज्यसभा सांसद, शिक्षाविद् और चिंतक सी. सदानंदन मास्टर ने कहा कि 1994 में कन्नूर में हुए हमले में उनके दोनों पैर काट दिए गए, लेकिन उनके विचारों और संकल्प को कोई नहीं तोड़ सका। उन्होंने कहा, “हमला मेरे शरीर पर हुआ, विचारों पर नहीं। संघ से मिले आत्मविश्वास और आत्मीयता ने हर विपरीत परिस्थिति में मुझे खड़ा रखा।”
संस्था ‘सार्थक’ द्वारा आयोजित प्रेरक व्याख्यान ‘संघर्ष से संसद तक : वैचारिक प्रतिबद्धता’ में सदानंदन मास्टर ने अपने जीवन के संघर्ष, राजनीतिक हिंसा, वैचारिक यात्रा और राज्यसभा तक पहुंचने के अनुभव साझा किए। कार्यक्रम में उनके साथ एंकर हार्दिक दवे ने संवाद किया।

उपशीर्षक: 25 जनवरी 1994 को हुआ था हमला
सदानंदन मास्टर ने बताया कि गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले 25 जनवरी 1994 को यात्रा के दौरान उन पर हमला किया गया और उनके दोनों पैर घुटनों के नीचे से काट दिए गए। लंबे इलाज और कृत्रिम पैरों के सहारे उन्होंने फिर से जीवन शुरू किया।
उन्होंने कहा, “मेरा मन तनिक भी विचलित नहीं हुआ। संघ की शाखा से मिला आत्मविश्वास, वरिष्ठ कार्यकर्ताओं का स्नेह और समाज का सहयोग मेरे लिए सबसे बड़ी शक्ति बने।”
कन्नूर की हिंसा और वैचारिक संघर्ष का किया उल्लेख
अपने संबोधन में उन्होंने कन्नूर में दशकों तक चली राजनीतिक हिंसा का उल्लेख करते हुए कहा कि वहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विस्तार के साथ वैचारिक टकराव बढ़ा।
उन्होंने कहा कि कई स्वयंसेवकों और उनके परिवारों को सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक कठिनाइयों और हिंसा का सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि “बाधाएं चाहे तूफान बनकर आएं, आदर्श की ज्योति कभी नहीं बुझ सकती।”

वामपंथी परिवार से संघ तक की यात्रा
संवाद के दौरान हार्दिक दवे ने उनसे पूछा कि वामपंथी परिवेश से निकलकर वे संघ और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद तक कैसे पहुंचे। इस पर सदानंदन मास्टर ने कहा कि विचार केवल पुस्तकों से नहीं बनते, बल्कि जीवन के अनुभव उन्हें आकार देते हैं। संघ से जुड़ने के बाद राष्ट्र, समाज और व्यक्ति के संबंध को देखने की उनकी दृष्टि बदली।
‘मास्टर’ मेरी पहचान है
उन्होंने कहा कि शिक्षक का जीवन उनके व्यक्तित्व का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। विद्यार्थियों के साथ लंबे समय तक काम करने के अनुभव ने उन्हें व्यक्ति निर्माण और युवा पीढ़ी के संस्कारों के महत्व को समझाया।

राज्यसभा का दायित्व अप्रत्याशित था
सदानंदन मास्टर ने बताया कि राज्यसभा के लिए उनका मनोनयन उनके लिए अप्रत्याशित था। उन्होंने कहा कि यह व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन असंख्य कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों के संघर्ष और बलिदान का सम्मान है जिन्होंने राष्ट्र के लिए काम किया।
लोकतंत्र, असहमति और हिंसा पर भी हुई चर्चा
संवाद में उनसे यह भी पूछा गया कि वैचारिक असहमति हिंसा का रूप क्यों ले लेती है और क्या राजनीतिक विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति को भी समान अधिकार मिलना चाहिए। इस पर उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों, संवाद और वैचारिक दृढ़ता की आवश्यकता पर बल दिया।
मानसिक स्वास्थ्य और युवाओं की चुनौतियों पर बोले
कार्यक्रम में तनाव, चिंता, तुलना, भय और भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसे विषयों पर भी चर्चा हुई। सदानंदन मास्टर ने कहा कि अवसाद कमजोरी नहीं, बल्कि चिकित्सकीय स्थिति है, और व्यक्ति को उद्देश्यबोध, सामाजिक जुड़ाव और सकारात्मक दृष्टि के माध्यम से कठिन परिस्थितियों से बाहर आने का प्रयास करना चाहिए।

जेन-जी और बदलते सामाजिक प्रश्नों पर विचार
उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि आज की पीढ़ी अवसरों के बीच भी असुरक्षा और तुलना के दबाव से गुजर रही है। ऐसे समय में आत्मविश्वास, अनुशासन और राष्ट्रबोध जीवन को दिशा दे सकते हैं।
इंदौर को बताया सौभाग्य की भूमि
सदानंदन मास्टर ने इंदौर और मध्यप्रदेश को अटल बिहारी वाजपेयी की कर्मभूमि, स्वतंत्रता सेनानियों की धरती और महाकालेश्वर तथा सांदीपनि आश्रम जैसी पवित्र परंपराओं से जुड़ी भूमि बताते हुए कहा कि यहां आना उनके लिए सौभाग्य की बात है।
सार्थक के प्रयासों की सराहना
उन्होंने संस्था ‘सार्थक’ और उसके प्रमुख दीपक जैन ‘टीनू’ के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन समाज में विचार और संवाद की नई जमीन तैयार करते हैं।
समापन में दिया भावुक संदेश
कार्यक्रम के अंत में सदानंदन मास्टर ने कहा कि “व्यक्ति समाप्त हो सकता है, लेकिन आदर्श और विचार की यात्रा समाप्त नहीं होती।” उन्होंने युवाओं से कठिन परिस्थितियों में भी अपने विश्वास और संकल्प को जीवित रखने का आह्वान किया।
कार्यक्रम में संस्था सार्थक के अध्यक्ष नितेश मुच्छाल, पंकज जैन, अमित सोनी, सिद्धार्थ निखरा, नितिन जोशी, आनंद बोकड़िया, तुषार गावड़े, गौरव नाहर, केशव पोरवाल सहित बड़ी संख्या में गणमान्यजन और युवा उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन विशाल डकोलिया ने किया तथा आभार अंकित रावल ने माना।