इंदौर TI दिनेश वर्मा तीन साल के लिए SI पद पर डिमोट: जीरो टॉलरेंस नीति के तहत हुई कार्रवाई; SC तक पहुंच चुका है पॉकेट गवाह का मामला

इंदौर। पॉकेट गवाहों के इस्तेमाल को लेकर इंदौर पुलिस कमिश्नरेट की कार्रवाई से पुलिस विभाग में हलचल मच गई है। खजराना थाने के टीआई और फिलहाल साइबर सेल में तैनात इंस्पेक्टर दिनेश वर्मा को तीन साल के लिए सब-इंस्पेक्टर पद पर डिमोट कर दिया गया है।
विभागीय जांच में दिनेश वर्मा को ऐसे गवाहों के इस्तेमाल का दोषी पाया गया, जिन्हें पुलिस ने कई अलग-अलग मामलों में बार-बार गवाह बनाया था।
वर्मा अगस्त 2020 से अगस्त 2023 तक खजराना थाने के TI रहे। विभागीय जांच में सामने आया कि इस अवधि में इरशाद पुत्र अब्दुल हकीम को 742 मामलों में और नवीन चौहान को 504 मामलों में गवाह बनाया गया। इन मामलों में हत्या, धोखाधड़ी और जानलेवा हमले जैसे गंभीर अपराध भी शामिल बताए गए हैं।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है पॉकेट गवाह का मामला
पॉकेट गवाहों के इस्तेमाल का मुद्दा नया नहीं है। इंदौर के चंदननगर थाने से जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। इसी मामले में तत्कालीन पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र दिया था।
शपथ-पत्र में पुलिस ने माना था कि दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि स्टॉक गवाहों का बार-बार इस्तेमाल किया गया। इसमें संबंधित जांच अधिकारियों द्वारा ऐसे 37 गवाहों के बार-बार उपयोग का उल्लेख किया गया था।
इस मामले में DCP, जोन-4 की ओर से संबंधित जांच अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। उनसे यह स्पष्टीकरण मांगा गया था कि किन परिस्थितियों में उन्हीं गवाहों का बार-बार इस्तेमाल किया गया।
पुलिस अधिकारियों को स्वतंत्र गवाह रखने के निर्देश
पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने 7 दिसंबर 2025 को सभी DCP को पत्र जारी कर स्वतंत्र और विश्वसनीय गवाहों के महत्व पर जोर दिया था। पत्र में कहा गया कि निष्पक्ष न्याय के लिए आपराधिक प्रकरणों में स्वतंत्र गवाह जरूरी हैं।
निर्देशों के मुताबिक, यदि किसी मामले में स्थानीय स्वतंत्र गवाह उपलब्ध नहीं है या सहयोग नहीं कर रहा है, तो इसकी वजह केस डायरी में दर्ज की जानी चाहिए। इसके बाद किसी अन्य व्यक्ति को गवाह बनाया जा सकता है, लेकिन वह स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए।
कई थानों में बार-बार उन्हीं लोगों के नाम आने का दावा
अलग-अलग थानों को लेकर कुछ ऐसे लोगों के नाम चर्चा में होने की बात सामने आती रही है, जिन्हें कई मामलों में गवाह बनाए जाने का दावा किया जाता है। हालांकि, केवल किसी व्यक्ति का कई मामलों में गवाह होना अपने आप में उसे ‘पॉकेट गवाह’ साबित नहीं करता। इसके लिए प्रत्येक मामले के रिकॉर्ड और गवाह की भूमिका की अलग-अलग जांच जरूरी है।
वर्मा के मामले में तत्कालीन CSP ने की थी जांच
दिनेश वर्मा के मामले में एक ही गवाहों के बार-बार इस्तेमाल को लेकर तत्कालीन CSP जयंत राठौर ने जांच की थी। इसके बाद DCP स्तर से विभागीय जांच के आदेश दिए गए। विभागीय जांच में आरोप सही पाए जाने के बाद अब पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने डिमोशन की कार्रवाई की है।
इस कार्रवाई के बाद पुलिस विभाग में यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि जांच में बार-बार एक ही गवाहों के इस्तेमाल की पुष्टि होती है तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ जांच अधिकारी तक सीमित रहेगी या संबंधित थाना प्रभारी की भूमिका भी जांच के दायरे में आएगी।
इंद्रमणि पटेल मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी उठा मुद्दा
पॉकेट गवाहों का मुद्दा इंदौर के तत्कालीन TI इंद्रमणि पटेल से जुड़े मामले में भी सुप्रीम कोर्ट के सामने उठा था। इस मामले में अदालत ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए थे। पुलिस की ओर से दाखिल शपथ-पत्र में बार-बार एक ही गवाहों के इस्तेमाल का उल्लेख किया गया था।
मामले में गवाहों के इस्तेमाल और जांच की प्रक्रिया को लेकर आगे की व्यवस्था के लिए कमेटी गठित किए जाने की बात भी सामने आई है। इस मामले में आगे होने वाली न्यायिक कार्यवाही पर पुलिस विभाग की भी नजर है।

‘पॉकेट गवाह’ पर कार्रवाई आगे कितनी बढ़ेगी?
दिनेश वर्मा के डिमोशन के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस विभाग अब ऐसे मामलों की व्यापक जांच कराएगा। पुलिस व्यवस्था में जांच अधिकारी ही सामान्य तौर पर गवाहों को केस में शामिल करता है और उनके बयान व दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करता है। ऐसे में थाना प्रभारी की जिम्मेदारी तय करने को लेकर भी कानूनी और विभागीय सवाल उठ सकते हैं।
यदि भविष्य में पुराने मामलों की समीक्षा होती है या इस मुद्दे पर उच्च स्तर की जांच बैठती है, तो कई थानों की जांच प्रक्रिया और पुराने केस भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
जीरो टॉलरेंस नीति के तहत पहले भी कार्रवाई
पुलिस कमिश्नर संतोष सिंह ने इससे पहले भी विभागीय मामलों में कार्रवाई की है। इंस्पेक्टर रवींद्र सिंह गुर्जर और अजय वर्मा समेत कई पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई की जा चुकी है। पुलिस कमिश्नरेट के अनुसार, अब तक करीब 20 पुलिसकर्मियों के खिलाफ बर्खास्तगी या अधिकारों में कमी जैसी कार्रवाई के आदेश जारी किए जा चुके हैं।