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विकास और विरासत साथ-साथ जरूरी: उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन

भारत के उपराष्ट्रपति C. P. Radhakrishnan ने कहा कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं और दोनों के संतुलन से ही राष्ट्र का समग्र विकास संभव है।

उन्होंने यह बात Bharat Mandapam में आयोजित “विज्ञान और प्रौद्योगिकी के हस्तक्षेप के माध्यम से आदिवासी जीवन का परिवर्तन” विषयक सम्मेलन के उद्घाटन के दौरान कही।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि “विकसित भारत 2047” का लक्ष्य हासिल करने का अर्थ अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूलना नहीं है। “विकास भी, विरासत भी” के सिद्धांत पर चलते हुए आधुनिक तकनीक और परंपराओं को साथ लेकर चलना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि जब विज्ञान और तकनीक भाषा, आस्था और संस्कृति के साथ सामंजस्य में काम करते हैं, तो यह संरक्षण और सशक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनते हैं। आदिवासी समुदायों के पारंपरिक ज्ञान को उन्होंने अमूल्य बताते हुए कहा कि यह जैव विविधता और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

उपराष्ट्रपति ने आदिवासी क्षेत्रों में हरित आर्थिक विकास की संभावनाओं पर जोर देते हुए कहा कि इन समुदायों की कला, वस्त्र और डिजाइन वैश्विक स्तर पर पहचान बना सकते हैं।

इस दौरान उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री Atal Bihari Vajpayee को जनजातीय मामलों के मंत्रालय की स्थापना के लिए श्रद्धांजलि अर्पित की और इसे आदिवासी समाज के सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

सरकारी पहलों का जिक्र करते हुए उन्होंने ‘प्रधानमंत्री-जनमन’ योजना और ‘धरती आभा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ की उपलब्धियों को रेखांकित किया, जिनका उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और जीवन स्तर को बेहतर बनाना है।

कार्यक्रम में Taranjit Singh Sandhu, Chowna Mein, Abhay Karandikar और Tarun Vijay सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।

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