MP में सिर्फ 25 कैडेवरिक अंगदान: धर्म नहीं, गलतफहमियां भी बन रहीं बाधा; सही जानकारी के अभाव में लोग हटते हैं पीछे

इंदौर। मध्यप्रदेश में अंगदान की स्थिति को लेकर राजनीतिक रणनीतिकार डॉ. अतुल मलिकराम ने धार्मिक धारणाओं और अंगदान के बीच संबंध पर चर्चा को जरूरी बताया है।
उन्होंने कहा कि कई बार परिवार अंतिम समय में अंगदान का निर्णय धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी गलतफहमियों के कारण नहीं ले पाते। डॉ. मलिकराम के मुताबिक वर्ष 2023 में देश में कुल 16,542 अंग प्रत्यारोपण हुए, लेकिन इसमें मध्यप्रदेश की हिस्सेदारी सिर्फ 1.6 प्रतिशत रही।
कैडेवरिक यानी मृत व्यक्ति के अंगदान के मामले में भी प्रदेश की स्थिति कम है। जनवरी 2018 से जून 2023 के बीच मध्यप्रदेश में सिर्फ 25 कैडेवरिक अंगदान दर्ज हुए। इसी अवधि में तेलंगाना में 883 और तमिलनाडु में 713 कैडेवरिक अंगदान हुए।
हिंदू धर्म में दान की व्यापक अवधारणा
डॉ. मलिकराम ने कहा कि हिंदू दर्शन में दान को केवल धन देने तक सीमित नहीं माना गया है। दूसरों के कल्याण के लिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार योगदान देने की भावना भी दान का हिस्सा है। इसी आधार पर अंगदान को मानव जीवन बचाने की भावना से जोड़ा जा सकता है। उन्होंने ऋषि दधीचि की कथा का उदाहरण देते हुए कहा कि लोककल्याण के लिए त्याग की भावना हिंदू परंपरा में महत्वपूर्ण रही है।
इस्लाम में अलग-अलग मत
उन्होंने कहा कि इस्लाम में अंगदान को लेकर अलग-अलग धार्मिक मत मौजूद हैं। इसे हर परिस्थिति में पूरी तरह जायज या नाजायज बताना उचित नहीं होगा। कई समकालीन इस्लामी विद्वान और संस्थाएं जीवन बचाने के उद्देश्य से कुछ शर्तों के साथ अंगदान की अनुमति देती हैं। इनमें स्वेच्छा, दाता की सुरक्षा और अंगों की खरीद-बिक्री से दूरी जैसे विषय शामिल हैं।
सिख और ईसाई धर्म में सेवा की भावना
डॉ. मलिकराम के अनुसार सिख परंपरा में मानवता की सेवा और ‘सरबत दा भला’ की भावना को विशेष महत्व दिया जाता है। ऐसे में अंगदान को जरूरतमंद व्यक्ति की मदद और जीवन बचाने के कार्य के रूप में देखा जा सकता है। इसी तरह ईसाई धर्म की शिक्षाओं में प्रेम, करुणा और दूसरों की सहायता पर जोर दिया गया है।
जैन धर्म में अहिंसा और करुणा का आधार
जैन धर्म के संदर्भ में उन्होंने कहा कि अहिंसा इसका प्रमुख सिद्धांत है। अंगदान के मामले में जरूरतमंद व्यक्ति का कष्ट कम करने और जीवन बचाने की भावना को महत्वपूर्ण माना जा सकता है। हालांकि शरीर, मृत्यु और अंगदान को लेकर व्यक्तिगत और धार्मिक दृष्टिकोण अलग हो सकते हैं।
धार्मिक संस्थाओं को जागरूकता अभियान से जोड़ने की जरूरत
डॉ. मलिकराम ने कहा कि अंगदान को केवल स्वास्थ्य विभाग का अभियान मानकर नहीं चलाया जाना चाहिए। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, चर्चों और जैन स्थानकों के माध्यम से भी अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। यदि अलग-अलग धार्मिक संस्थाओं से जीवन बचाने के लिए अंगदान का सकारात्मक संदेश सामने आता है तो इसका समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश में अंगदान की संख्या बढ़ाने के लिए धार्मिक धारणाओं को समझने के साथ-साथ वैज्ञानिक जानकारी भी लोगों तक पहुंचाना जरूरी है। उनका कहना है कि मृत्यु के बाद शरीर के अंगों का उपयोग किसी दूसरे व्यक्ति का जीवन बचाने में किया जा सकता है और इसी सोच के साथ अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है।