होलिका दहन: परंपरा का संदेश और वैचारिक विकृतियों से सावधानी

आज के वैचारिक उपनिवेशवादियों ने भारत की सांस्कृतिक स्मृति पर तलवारों से अधिक गहरा हमला किया है। उनका यह हमला शब्दों और व्याख्याओं के माध्यम से हो रहा है, न कि सीमाओं के जरिए।
वे यह दावा करते हैं कि होली, होलिका दहन और प्रह्लाद की कथा किसी दलित नारी के जलाए जाने की कहानी है। परंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। होलिका किसी अबला स्त्री की कथा नहीं है। वह सशक्त, छल से प्रेरित और अधर्म की सहायक थी। जब उसने प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठती है, तो उसका जलना अधर्म की पराजय और सत्य की विजय का प्रतीक है।
होलिका दहन का सांस्कृतिक संदेश जीवन की नकारात्मकता के दहन, भक्ति की शक्ति, अधर्म का अंत और सत्य की रक्षा है। इसे किसी महिला विरोध, समाज विरोध या सत्ता विरोध के रूप में प्रस्तुत करना न केवल गलत है, बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति का अपमान है।
आज कुछ लोग पुराणों और कथाओं को वर्गीय, जातीय और जेंडरवादी दृष्टि से विकृत कर देते हैं। ये मानसिकताएं सत्य को तोड़-मरोड़ कर पेश करती हैं और भारतीय चेतना के मूल संदेश को बदलने का प्रयास करती हैं।
होलिका दहन केवल अधर्म और अहंकार के विनाश का पर्व है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि जीवन में सत्य और धर्म का मार्ग अपनाना ही वास्तविक विजय है। हमें अपनी सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रखर करना होगा और परंपराओं के कालातीत संदेश को समझना होगा।
अंततः, होलिका दहन पर चल रही वैचारिक आलोचनाएं केवल भ्रम फैलाने और परंपरा को विकृत करने का प्रयास हैं। यह पर्व हमेशा सत्य, धर्म और भक्ति के उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है, और यही भारतीय संस्कृति की स्थायी शक्ति है।






