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EXCLUSIVE: पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े समेत 8 बरी: पुलिस की जांच पर उठे सवाल; इंदौर की MP-MLA कोर्ट ने सुनाया फैसला

देवेंद्र मीणा। इंदौर। इंदौर की विशेष सांसद-विधायक MP-MLA कोर्ट ने पूर्व विधायक विपिन वानखेड़े और उनके 7 साथियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी भी की है।

मामला सरकारी काम में बाधा डालने और पुलिसकर्मियों को धमकाने का है। 23 नवंबर 2020 को आगर-मालवा के बड़ौद थाने में तत्कालीन थाना प्रभारी ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन विधायक विपिन वानखेड़े अपने समर्थकों के साथ थाने में घुसे।

पुलिस की कार्रवाई का विरोध करते हुए शासकीय कार्य में बाधा डाली। हालांकि, बचाव पक्ष के अधिवक्ता आशीष एस शर्मा के तर्कों और कोर्ट के सूक्ष्म अवलोकन के बाद अदालत ने अभियोजन के आरोपों को पूरी तरह संदेहास्पद माना और विपिन वानखेड़े सहित सभी 8 आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया।

  • मौखिक कहासुनी,तर्क-वितर्क शासकीय काम में बाधा नहीं 
    अदालत ने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा- केवल किसी बात को लेकर जन प्रतिनिधियों या आम नागरिकों का पुलिस अधिकारियों से वाद-विवाद करना अपराध नहीं है। जब तक इसमें कोई हमला या आपराधिक बल का प्रयोग न किया गया हो। इसे धारा 353 IPC का अपराध नहीं माना जा सकता।
  • सीसीटीवी फुटेज में धक्का-मुक्की का कोई साक्ष्य नहीं
    कोर्ट ने घटना के सीसीटीवी फुटेज का अवलोकन किया। फुटेज में ऐसा कहीं भी दिखाई नहीं दिया जहां आरोपियों ने थाना प्रभारी या किसी अन्य पुलिसकर्मी के साथ धक्का-मुक्की या हाथापाई की हो।
  • सबसे अहम साक्ष्य कोर्ट से छिपाया या पेश नहीं किया गया 
    अदालत ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाते हुए कहा- घटना थाना प्रभारी के कक्ष की बताई गई थी। पुलिस ने उस कमरे का सीसीटीवी फुटेज और ऑडियो-वीडियो क्लिप अदालत के समक्ष पेश ही नहीं की। इसलिए उत्कृष्ट साक्ष्य प्रस्तुत न करना अभियोजन की कहानी पर गहरा संदेह पैदा करता है।
  • विधिक प्रक्रिया की अनदेखी
    न्यायालय ने पाया कि धारा 186 IPC के तहत मामला चलाने के लिए कानून के अनुसार सक्षम प्राधिकारी द्वारा लिखित शिकायत प्रस्तुत की जानी अनिवार्य थी, जो इस मामले में नहीं की गई।

तर्क-वितर्क अपराध नहीं
आरोप थे कि आरोपीगण द्वारा धक्का-मुक्की की गई। लेकिन न्यायालय द्वारा आर्टिकल ए-1 के अवलोकन से ऐसी कोई स्थिति दर्शित नहीं होती। लोक सेवकों के साथ केवल वाद-विवाद या तर्क-वितर्क होना धारा 353 का अपराध गठित नहीं करता। जब तक कि आपराधिक बल का प्रयोग न हुआ हो।

पुलिस ने नहीं पेश किए CCTV
थाना प्रभारी के कमरे की सीसीटीवी फुटेज ऑडियो-वीडियो क्लिप अभियोजन द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। सर्वश्रेष्ठ साक्ष्य को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत न करने से अभियोजन की कहानी पर संदेह उत्पन्न होता है। इसलिए आरोपीगण को संदेह का लाभ देकर दोषमुक्त किया जाता है।

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