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नेपाल चुनाव में वामपंथी दलों की बड़ी हार, दहाई का आंकड़ा भी नहीं छू पाए प्रमुख कम्युनिस्ट दल

नेपाल में हुए हालिया संसदीय चुनाव में वामपंथी दलों को बड़ा झटका लगा है। 5 मार्च को हुए चुनाव में जहां राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भारी सफलता मिली है और वह दो-तिहाई बहुमत के साथ सरकार बनाने की स्थिति में है, वहीं लंबे समय से सत्ता में प्रभाव रखने वाले वामपंथी दल दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाए

चुनाव के प्रत्यक्ष परिणामों के अनुसार नेपाल के प्रमुख कम्युनिस्ट दलों का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा है।

प्रमुख वामपंथी दलों का खराब प्रदर्शन

पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के नेतृत्व वाली सीपीएन-यूएमएल को केवल 9 सीटें मिली हैं। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ के नेतृत्व वाली नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी को सिर्फ 7 सीटें ही मिल सकीं।

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. बाबूराम भट्टराई के नेतृत्व वाली प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। माओवादी सहित अन्य छोटे वामपंथी दलों का भी इस चुनाव में लगभग सूपड़ा साफ हो गया

विश्लेषकों के अनुसार भारत विरोधी राष्ट्रवाद की राजनीति के सहारे सत्ता तक पहुंचने वाले इन दलों को इस बार जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है।

दशकों तक रहा कम्युनिस्ट दलों का प्रभाव

नेपाल में 1990 के जन आंदोलन के बाद से कम्युनिस्ट दलों का राजनीति पर मजबूत प्रभाव रहा है। धीरे-धीरे ये दल नेपाली कांग्रेस के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बनकर उभरे थे।

1991 के चुनाव में सीपीएन-यूएमएल ने 69 सीटें जीती थीं, जबकि 1994 के मध्यावधि चुनाव में यूएमएल 88 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।

2008 में कम्युनिस्ट दलों का चरम दौर

2008 के संविधान सभा चुनाव में कम्युनिस्ट दलों को ऐतिहासिक सफलता मिली थी। उस समय सीपीएन (माओवादी) ने 220 सीटें, जबकि यूएमएल ने 103 सीटें जीती थीं। इस तरह संविधान सभा में कम्युनिस्ट दलों का व्यापक प्रभाव स्थापित हो गया था।

आंतरिक संघर्ष से कमजोर हुई ताकत

हालांकि बाद के वर्षों में गुटबाजी, नेतृत्व विवाद और नीतिगत अस्थिरता के कारण कम्युनिस्ट दलों की चुनावी ताकत लगातार कमजोर होती गई।

2017 में लेफ्ट एलायंस बनने के बाद उन्हें फिर से संसदीय बहुमत मिला था, लेकिन हालिया चुनाव में छोटे कम्युनिस्ट दल लगभग समाप्त हो गए हैं और केवल सीमित उपस्थिति ही बची है।

शहरी मतदाताओं ने किया खारिज

विश्लेषकों का कहना है कि शहरी मतदाताओं के मतदान पैटर्न से साफ संकेत मिलता है कि उन्होंने पारंपरिक कम्युनिस्ट राजनीति को नकार दिया है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि कम्युनिस्ट दलों ने नेतृत्व और नीतियों में सुधार नहीं किया, तो आने वाले वर्षों में नेपाली राजनीति में उनका प्रभाव और कम हो सकता है।

नेतृत्व परिवर्तन के संकेत नहीं

चुनावी हार के बावजूद सीपीएन-यूएमएल में नेतृत्व परिवर्तन के संकेत फिलहाल नहीं दिख रहे हैं। पार्टी अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने पद छोड़ने का कोई संकेत नहीं दिया है।

वहीं पुष्पकमल दहल ‘प्रचंड’ ने भी देशभर में पार्टी की हार के बावजूद अपने गुट की ताकत बरकरार रहने का दावा किया है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि नई सरकार सुशासन और विकास के जनादेश को सही तरीके से लागू करती है, तो नेपाल में कम्युनिस्ट दलों का ऐतिहासिक प्रभाव धीरे-धीरे हाशिये पर जा सकता है।

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