नेपाल में संविधान संशोधन की तैयारी तेज: पांच प्रमुख विषयों पर विशेषज्ञों और दलों से संवाद

नेपाल में संविधान संशोधन को लेकर बहस और चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। बालेन्द्र शाह सरकार द्वारा संविधान संशोधन पर बहस-पत्र तैयार करने के लिए गठित कार्यदल विभिन्न राजनीतिक दलों, संवैधानिक विशेषज्ञों और संबंधित पक्षों के साथ लगातार संवाद कर रहा है। सरकार ने इस प्रक्रिया में पांच प्रमुख विषयों को प्राथमिकता देते हुए व्यापक विचार-विमर्श शुरू किया है।
प्रधानमंत्री के राजनीतिक सलाहकार असीम शाह के नेतृत्व में गठित कार्यदल ने मुख्य रूप से शासन प्रणाली, निर्वाचन प्रणाली, संघीयता, न्यायपालिका और संवैधानिक निकायों से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता दी है। कार्यदल के अनुसार, इन प्रमुख शीर्षकों के अंतर्गत कुल 46 बिंदुओं को चर्चा के लिए शामिल किया गया है।
सरकार विशेष रूप से शासन प्रणाली में बदलाव के विकल्पों पर विचार कर रही है। इसमें वर्तमान व्यवस्था को बनाए रखने, पूर्ण संसदीय प्रणाली लागू करने या संशोधित संसदीय प्रणाली अपनाने जैसे प्रस्तावों पर चर्चा हो रही है। इसके अलावा प्रत्यक्ष निर्वाचित कार्यकारी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की व्यवस्था लागू करने को लेकर भी राय ली जा रही है।
संविधान संशोधन बहस में मंत्रिपरिषद गठन, मंत्रियों की जवाबदेही और विशेषज्ञ मंत्रियों की नियुक्ति जैसे विषय भी प्रमुखता से शामिल किए गए हैं। सरकार यह भी जानना चाहती है कि सांसदों को मंत्री बनाए जाने की वर्तमान प्रणाली में बदलाव होना चाहिए या नहीं।
निर्वाचन प्रणाली को लेकर भी कई विकल्पों पर चर्चा जारी है। इनमें प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली, पूर्ण समानुपातिक प्रणाली और मिश्रित निर्वाचन प्रणाली की उपयोगिता और आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया जा रहा है। वहीं प्रदेश व्यवस्था से जुड़े मुद्दों में प्रदेशों की संख्या, प्रादेशिक ढांचे में सुधार और प्रत्यक्ष निर्वाचित मुख्यमंत्री की व्यवस्था पर विशेषज्ञों की राय मांगी गई है।
स्थानीय निकायों को लेकर भी सरकार तीन अहम विषयों पर चर्चा कर रही है। इनमें वर्तमान दलीय व्यवस्था जारी रखने या दलविहीन स्थानीय निकाय चुनाव प्रणाली अपनाने की संभावनाओं पर विचार किया जा रहा है। साथ ही स्थानीय सरकारों को अधिक जवाबदेह बनाने और न्यायिक समितियों में सुधार के उपायों पर भी विमर्श जारी है।
सरकार ने न्यायपालिका में सुधार और संवैधानिक निकायों की कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने को भी प्राथमिकता दी है। इसमें संवैधानिक संस्थाओं की संख्या, नियुक्ति प्रक्रिया, स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन जैसे अहम मुद्दों को चर्चा का हिस्सा बनाया गया है।






