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झाबुआ के आदिवासी अंचल में ‘नवई’ पर्व की धूम: किसानों ने देवी-देवताओं को अर्पित की नई फसल; पूर्वजों को भी किया याद

झाबुआ। जिले के आदिवासी अंचल में इन दिनों नई फसल के स्वागत का प्रमुख पर्व ‘नवई’ (नवाई) पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। रंभापुर के समीप स्थित प्रसिद्ध तीर्थ स्थल श्री हनुमंत निवास आश्रम, पीपलखूंटा में एक सप्ताह से नवई का आयोजन चल रहा है।

पेटलावद क्षेत्र के कोदली सहित अनेक गांवों में भी यह उत्सव जारी है। इस अवसर पर दूर-दराज से किसान मक्का के भुट्टे, भिंडी, किकोड़, करेला, काचरी, ककड़ी और अन्य नई कृषि उपज लेकर आश्रम और देव स्थान पहुंच रहे हैं।

भगवान को भोग और पूजन की परंपरा
भील जनजाति की इस प्राचीन परंपरा के तहत किसान अपनी मेहनत से उगाई गई नई फसल को ग्रहण करने से पहले अपने आराध्य को अर्पित करते हैं। पीपलखूंटा आश्रम में किसानों ने हनुमानजी को भोग लगाकर श्रीफल और अगरबत्ती अर्पित की।

आश्रम के महंत 1008 दयारामदासजी महाराज ने बताया कि किसान अपनी पहली उपज का अंश प्रभु को समर्पित कर रहे हैं। पेटलावद में भी कोदली गांव में सावन माता, बाबा खेड़ापति देव, लालबाई-फूलबाई, हनुमान वीर और माता शीतला सहित स्थानीय देवी-देवताओं को नया अनाज चढ़ाने के बाद ही समाज के लोग इसका सेवन करते हैं।

पूर्वजों और कुलदेवताओं की आराधना
नवाई उत्सव के दौरान आदिवासी समाज द्वारा बाबा गणेश के नाम से नारियल फोड़कर विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान पूर्वजों (खत्रीज) को याद कर उनकी पूजा की जाती है और परंपरा के अनुसार देसी मदिरा की धार भी डाली जाती है।

परिवार और समाज की समृद्धि, अच्छी बारिश तथा फसल की मंगलकामना के लिए होने वाले इस सामूहिक अनुष्ठान में गांव के सभी लोग, बहन-बेटियां और रिश्तेदार शामिल होते हैं।

संस्कृति और सनातन का अनूठा संगम
सामाजिक कार्यकर्ता राजेश मैंडा ने इस अवसर पर कहा कि जातर ‘नवाई’ केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी बोली, संस्कृति और पूर्वजों की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सनातन संस्कृति की मूल जड़ है और दोनों की पूजा पद्धतियां एक-दूसरे की पूरक हैं।

कार्यक्रम में गांव के तड़वी काना मैंडा, कोटवार हुरसिंह मैड़ा, टीटीया मैड़ा सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण और वरिष्ठ जन उपस्थित रहे, जिन्होंने इस प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का संकल्प लिया।

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