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हनीट्रैप पार्ट 2: वीडियो बनाने वाला कैमरा गायब, मिला सिर्फ चार्ज; मोबाइल लापता और चार्जशीट तैयार

इंदौर। हनीट्रैप पार्ट-2 में क्राइम ब्रांच ने शराब कारोबारी चिंटू ठाकुर को जाल में फंसाने के मामले में महिला आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश कर दिया है।

लेकिन चार्जशीट के साथ ही जांच को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब अब अदालत में तलाशा जाएगा। पुलिस जिस खुफिया कैमरे को कथित हनीट्रैप की सबसे अहम कड़ी मान रही थी। वही कैमरा जांच में बरामद नहीं हुआ।

पुलिस के हाथ कैमरे का सिर्फ चार्जर लगा
एक महिला आरोपियों के पास से पुलिस के हाथ कैमरे का सिर्फ चार्जर लगा।आपत्तिजनक वीडियो और रिकॉर्डिंग को पुलिस ने जांच में अहम साक्ष्य माना, लेकिन जिस मोबाइल में यह वीडियो होने का दावा किया गया, वह मोबाइल भी पुलिस बरामद नहीं कर सकी। पूछताछ में आरोपियों को ने मोबाइल को सिरपुर तालाब में फेंकने की बात कही। यानी जिस डिवाइस में कथित रिकॉर्डिंग मौजूद होने की बात सामने आई, उसका भी पुलिस के पास कोई भौतिक सबूत नहीं है।

वीडियो का दावा, लेकिन मूल डिवाइस गायब
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल डिजिटल साक्ष्य को लेकर है। पुलिस के अनुसार आरोपियों को महिलाओं ने प्रतिष्ठित लोगों को जाल में फंसाकर उनके वीडियो बनाए और बाद में ब्लैकमेल किया। यदि ऐसा था तो उन वीडियो की मूल रिकॉर्डिंग किस डिवाइस में हुई? वह डिवाइस कहां है? उसकी मेमोरी या स्टोरेज कहां है? और जिस मोबाइल में वीडियो मौजूद था, वह पुलिस की गिरफ्त में क्यों नहीं आया? जांच एजेंसी के सामने मूल कैमरा और मोबाइल दोनों की बरामदगी चुनौती बनी रही। इसके बावजूद क्राइम ब्रांच ने गवाहों के बयान, आरोपियों और फरियादियों के बयान और उपलब्ध सबूतों के आधार पर चालान अदालत में पेश कर दिया।

चार्जर मिला, कैमरा नहीं- यह कैसी कड़ी?
जांच में कैमरे का चार्जर मिलना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसी कैमरे से वीडियो बनाया गया था। इसके लिए कैमरे की बरामदगी, उसकी मेमोरी, उसमें मौजूद डेटा और रिकॉर्डिंग की फॉरेंसिक जांच जैसी कड़ियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिस हथियार से हनीट्रैप की पूरी कहानी रची गई, जब वही हथियार पुलिस के हाथ नहीं लगा तो जांच की डिजिटल रीढ़ कितनी मजबूत है?

एडिटेड फोटो जब्त करने का दावा
पुलिस ने चिंटू ठाकुर का एक एडिटेड फोटो जब्त करने का दावा किया है। लेकिन फोटो की बरामदगी और वीडियो की मूल रिकॉर्डिंग अलग-अलग साक्ष्य हैं। इसलिए अब अदालत में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक और सबूत आपस में किस तरह जुड़ते हैं।

मोबाइल ‘तालाब’ में, सवाल जांच पर
आरोपियों को के बयान के मुताबिक मोबाइल सिरपुर तालाब में फेंका गया। अगर मोबाइल में वीडियो था तो उसकी बरामदगी जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती थी। लेकिन मोबाइल नहीं मिलने से जांच की एक अहम कड़ी अधूरी रह गई। अब सवाल यह भी है कि मोबाइल की तलाश के लिए पुलिस ने क्या-क्या प्रयास किए? क्या वीडियो की कोई दूसरी कॉपी, बैकअप, क्लाउड स्टोरेज, दूसरे मोबाइल या किसी अन्य डिजिटल माध्यम से बरामदगी हुई? यदि हुई तो उसकी मूलता और स्रोत कैसे स्थापित किया गया? ये वे सवाल हैं, जिन पर अदालत में बचाव पक्ष की ओर से भी सवाल उठना तय माना जा रहा है।

प्रधान आरक्षक की भूमिका भी धुंधली
मामले में प्रधान आरक्षक विनोद शर्मा को भी आरोपियों को बनाया गया है। पुलिस ने उसका अलका दीक्षित से संपर्क बताया है, लेकिन उसकी कथित भूमिका को लेकर तस्वीर उतनी स्पष्ट नजर नहीं आती। महज संपर्क और आपराधिक साजिश में सक्रिय भूमिका के बीच अंतर है। इसलिए यह भी अदालत में महत्वपूर्ण होगा कि पुलिस ने उसके खिलाफ कौन से ठोस साक्ष्य जुटाए हैं।

रेशू की गिरफ्तारी पर भी उठ रहे सवाल
वहीं रेशू की गिरफ्तारी को लेकर भी पुलिस की कार्रवाई सवालों के घेरे में है। पुलिस रिकॉर्ड में उसकी गिरफ्तारी शिप्रा पुल से होना दर्शाया गया है। ऐसे में गिरफ्तारी की परिस्थितियां क्या थीं, पुलिस को उसकी मौजूदगी की सूचना कैसे मिली और उसकी कथित भूमिका क्या रही। इन बिंदुओं पर भी आगे न्यायिक परीक्षण होना है।

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