बांग्लादेश में ‘जुलाई राष्ट्रीय चार्टर’ पर सियासी संग्राम, गृहमंत्री ने बताया ‘राष्ट्रीय धोखाधड़ी’

बांग्लादेश में “जुलाई 2025 राष्ट्रीय चार्टर (संवैधानिक सुधार) कार्यान्वयन आदेश” को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। गृहमंत्री Salahuddin Ahmed ने इस आदेश को “अंतहीन छल” और “राष्ट्रीय धोखाधड़ी” करार देते हुए इसकी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
संसद में दिए गए बयान में गृहमंत्री ने कहा कि यह आदेश शुरू से ही अवैध है और इसकी कोई कानूनी मान्यता नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि अंतरिम सरकार ने इस दस्तावेज को पेश करते समय विभिन्न राजनीतिक दलों के विरोध के नोट्स को शामिल नहीं किया, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ छल है।
उन्होंने 7 अप्रैल 1973 के बाद राष्ट्रपति के अधिकारों का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह के आदेश जारी करने की शक्ति समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में यह आदेश “शुरू से ही शून्य” है और इसे न तो कानून माना जा सकता है और न ही वैध अध्यादेश।
गृहमंत्री ने जनमत संग्रह की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि मतदाताओं को चार अलग-अलग मुद्दों पर केवल “हां” या “नहीं” में जवाब देने के लिए बाध्य किया गया, जो लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कार्यवाहक सरकार को इतने बड़े संवैधानिक फैसले लेने का अधिकार नहीं होता।
इस दौरान Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि पार्टी सुधारों के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह राजनीतिक सहमति के आधार पर बदलाव चाहती है।
वहीं, विपक्ष की ओर से Shafiqur Rahman ने भी सरकार पर निशाना साधा। Bangladesh Jamaat-e-Islami के अमीर रहमान ने आरोप लगाया कि संसद में उनके बयान को कानून मंत्री ने गलत तरीके से पेश किया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई।
The Daily Star की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्ष ने समिति गठन के प्रस्ताव को सैद्धांतिक रूप से स्वीकार किया है, लेकिन यह शर्त रखी है कि समिति में सरकार और विपक्ष का समान प्रतिनिधित्व हो। उनका कहना है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व से निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है।
गृहमंत्री ने समाधान के रूप में एक विशेष संसदीय समिति के गठन का प्रस्ताव रखा है, जिसमें सभी दलों और निर्दलीय सदस्यों को शामिल किया जाएगा। यह समिति संवाद और आम सहमति के आधार पर संवैधानिक संशोधन का मसौदा तैयार करेगी।
इस पूरे घटनाक्रम के चलते बांग्लादेश में सरकार और विपक्ष के बीच विश्वास का संकट गहराता जा रहा है। संवैधानिक सुधार जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर सहमति बनना फिलहाल चुनौतीपूर्ण नजर आ रहा है।






