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उज्जैन में युवा धर्म संसद को संबोधित कर रहे भागवत: कहा- युवा का भविष्य भी धर्म ही सुरक्षित करेगा; बोले- धर्म और रिलिजियस अलग है

उज्जैन। युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म, पर्यावरण, विज्ञान और जीवन मूल्यों पर अपने विचार रखे।

उन्होंने कहा कि धर्म एक ऐसी कल्पना है, जिसकी खोज में यदि जन्मों भी बीत जाएं, तब भी उसे पूरी तरह समझ पाना आसान नहीं है। धर्म के विचार की शुरुआत व्यक्ति को तभी से करनी चाहिए जब से उसे समझ आने लगे, क्योंकि यही वह मार्ग है जो मनुष्य को सभी सुख और अंततः मोक्ष की प्राप्ति कराता है।

मानव निर्माण के बाद 4 हजार प्रजातियां नष्ट हुई 
पर्यावरण और जीव-जंतुओं के संरक्षण पर चिंता व्यक्त करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि मनुष्य का कर्तव्य यह नहीं है कि वह इतने ज्यादा जीवों का शिकार करे और वनस्पतियों का उपभोग करे कि पृथ्वी पर कुछ बचे ही नहीं। उन्होंने बताया कि मानव सभ्यता के निर्माण के महज 7 हजार सालों के अंदर ही 4 हजार जीवों की प्रजातियां और 12 हजार वनस्पतियों की प्रजातियां केवल इसलिए नष्ट हो गई हैं क्योंकि हमने वहां कॉलोनियां और बस्तियां बसा लीं।
भौतिक और आध्यात्मिक सुख के लिए धर्म जरूरी 
धर्म की वास्तविक परिभाषा समझाते हुए उन्होंने कहा कि जो भौतिक जगत और आध्यात्मिक जगत दोनों की प्रगति सुनिश्चित करे, वही धर्म है। धर्म जीवन से दूर भागने या सब कुछ छोड़ देने का नाम नहीं है, बल्कि धर्म यह सिखाता है कि हमारे पास सब कुछ हो, लेकिन हम उससे आसक्त न हों यानी मुक्त रहें। भौतिक सुख हो या आध्यात्मिक सुख, दोनों की प्राप्ति के लिए धर्म की आवश्यकता होती है, क्योंकि धर्म हर व्यक्ति के मूल स्वभाव का ध्यान रखकर उसका निर्माण करता है।
धर्म का अर्थ इंसान को बंधनों से मुक्त करना
‘रिलिजियस’ और ‘भारतीय धर्म’ के अंतर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि बाद के लोगों ने इसे ‘रिलिजियस’ नाम दे दिया, लेकिन ‘रिलिजियस’ और ‘धर्म’ दोनों अलग अवधारणाएं हैं। ‘रिलिजियस’ का शाब्दिक अर्थ बांधना है, जबकि ‘धर्म’ का अर्थ है धारण करना और इंसान को सभी बंधनों से मुक्त करना। हमारा सनातन धर्म हमें ज्ञानवान, धनवान बनने और समाज के दुर्बलों की रक्षा करने का संदेश देता है और युवाओं का भविष्य भी केवल धर्म के मार्ग से ही सुरक्षित हो सकता है।
धर्म संपूर्ण विश्व को धारण करता है 
विज्ञान और प्राकृतिक नियमों का उदाहरण देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि धर्म वही है जो संपूर्ण विश्व की धारणा करता है। यह एक ऐसा अटल नियम है, जिसे आप मानें या न मानें, उसका अस्तित्व बना रहता है। उन्होंने उदाहरण दिया कि न्यूटन के जमाने से बहुत पहले भी सेब ऊपर से नीचे ही गिरता था। यदि कोई कहे कि हम गुरुत्वाकर्षण को नहीं मानते, तो आपके न मानने से उस नियम पर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि वह नियम वहां मौजूद है। यदि हम प्रकृति और ब्रह्मांड के इन नियमों के अनुसार चलते हैं, तभी हम उसके पार जा सकते हैं, अन्यथा नहीं।
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