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ब्रह्मपुत्र पर चीन का मेगा डैम जारी रहेगा: नेपाल में तबाही के बाद भी नहीं बदला फैसला; भारत की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक बना रहा है। नेपाल में हाल ही में आई बाढ़ और भूस्खलन के बाद इस तरह के बड़े प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद चीन ने इस परियोजना को रोकने का कोई संकेत नहीं दिया है।

चीन यह डैम तिब्बत में यारलुंग जांगबो नदी पर बना रहा है। यही यारलुंग जांगबो नदी भारत में आने के बाद अरुणाचल प्रदेश में सियांग और असम में ब्रह्मपुत्र कहलाती है। चीन ने जुलाई 2025 में इस प्रोजेक्ट का काम शुरू किया था। चीनी प्रधानमंत्री ली च्यांग ने इसे ‘सदी की परियोजना’ बताया था।

यह प्रोजेक्ट नदी के उस हिस्से में बनाया जा रहा है, जहां नदी एक बड़े मोड़ से गुजरती है। इस जगह नदी काफी ऊंचाई से नीचे आती है। इसलिए यहां बिजली बनाने की काफी क्षमता है।

1.2 ट्रिलियन युआन खर्च होंगे
इस प्रोजेक्ट पर करीब 1.2 ट्रिलियन युआन खर्च होने का अनुमान है। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब 14 लाख करोड़ रुपए है। प्रोजेक्ट में पांच पावर स्टेशन बनाए जाएंगे। इसकी कुल क्षमता करीब 60 गीगावाट हो सकती है। इससे हर साल करीब 300 अरब किलोवॉट-घंटे बिजली पैदा हो सकती है। यह चीन के थ्री गॉर्जेस डैम से तीन गुना से ज्यादा बिजली हो सकती है।

नेपाल की बाढ़ के बाद चिंता क्यों बढ़ी?
नेपाल में हाल में आई बाढ़ और भूस्खलन ने हिमालयी क्षेत्र में बड़े बांधों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। हिमालय भूकंप के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है। यहां भूकंप और भूस्खलन की घटनाएं होती रहती हैं।

इस इलाके में ग्लेशियर से जुड़ी घटनाओं का खतरा भी रहता है। ऐसे में इतने बड़े डैम की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। प्रोजेक्ट के इलाके में पाइजेन फॉल्ट को लेकर भी चिंता है। यह एक सक्रिय भूगर्भीय क्षेत्र है। एक चीनी अध्ययन में भी इस इलाके की जमीन और पहाड़ों की स्थिरता को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

भारत को किस बात की चिंता?
भारत की सबसे बड़ी चिंता ब्रह्मपुत्र के पानी के बहाव को लेकर है। ब्रह्मपुत्र अरुणाचल प्रदेश और असम के लिए बेहद महत्वपूर्ण नदी है। इस नदी के पानी से खेती और बिजली उत्पादन होता है। बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका भी इससे जुड़ी है।

भारत को चिंता है कि डैम बनने के बाद नदी के पानी के बहाव में बदलाव हो सकता है। यह भी सवाल है कि चीन डैम में कितना पानी जमा करेगा। इससे भारत की ओर आने वाले पानी पर क्या असर होगा, इसे लेकर अभी पूरी जानकारी सामने नहीं आई है।

नदी से जुड़े आंकड़े भी अहम
भारत और चीन के बीच सीमा पार बहने वाली नदियों को लेकर बातचीत होती है। दोनों देशों के बीच एक Expert-Level Mechanism भी है। इसके तहत नदी के पानी और बहाव से जुड़ी जानकारी साझा की जाती है।

भारत चाहता है कि चीन ऐसे प्रोजेक्ट्स को लेकर ज्यादा जानकारी दे। भारत का कहना है कि नदी के निचले हिस्से में रहने वाले देशों के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए।

चीन का क्या कहना है?
चीन का कहना है कि वह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर जिम्मेदारी से काम करता है। इस प्रोजेक्ट से बिजली उत्पादन बढ़ेगा। बाढ़ से निपटने में भी मदद मिलेगी। बीजिंग का यह भी कहना है कि इस प्रोजेक्ट से भारत और दूसरे निचले देशों पर कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा।

प्रोजेक्ट पर काम क्यों नहीं रोक रहा चीन?
चीन ने इस परियोजना को अपनी ऊर्जा योजना का बड़ा हिस्सा बनाया है। यारलुंग जांगबो नदी पर बनने वाला यह प्रोजेक्ट चीन की 2026 से 2030 की पंचवर्षीय योजना में भी शामिल है।

इससे साफ है कि चीन इस परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। अब भारत और चीन के बीच इस प्रोजेक्ट को लेकर बातचीत अहम होगी। आने वाले समय में पानी का बहाव, पर्यावरण, डैम की सुरक्षा और नदी से जुड़े आंकड़े सबसे बड़े मुद्दे रहेंगे।

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