उज्जैन में 40 साल पुराने पुजारी विवाद पर फैसला: सिद्धवट-सिद्धेश्वर के अधिकार मान्य; कालभैरव का दावा खारिज

उज्जैन। भैरवगढ़ स्थित कालभैरव, सिद्धवट और सिद्धेश्वर महादेव मंदिर में पुजारी अधिकार को लेकर 40 साल से चल रहे कानूनी विवाद में अदालत का फैसला आ गया है।
द्वितीय जिला न्यायाधीश हेमंत सविता की अदालत ने वादी पक्ष का दावा आंशिक रूप से स्वीकार किया है। अदालत ने 25 अगस्त 2026 को उज्जैन में खुले न्यायालय में फैसला घोषित किया।
सिद्धेश्वर महादेव मंदिर से जुड़े अधिकारों को मान्यता
अदालत ने स्पष्ट किया कि कालभैरव मंदिर में वंश परंपरा के आधार पर पूजा-अर्चना और नैवेद्य प्राप्त करने का अधिकार वादी पक्ष साबित नहीं कर सका। वहीं, पूर्व के राजीनामे के आधार पर सिद्धवट और सिद्धेश्वर महादेव मंदिर से जुड़े अधिकारों को अदालत ने मान्यता प्रदान की है।
क्या था पूरा विवाद?
विवाद की मुख्य वजह पुजारी पद पर नियुक्ति और उससे जुड़े अधिकार थे। रिकॉर्ड के अनुसार, कालभैरव मंदिर के पुजारी पद को लेकर प्रशासनिक स्तर पर कई आदेश जारी हुए थे। 1986 में उज्जैन संभाग आयुक्त ने पन्नालाल की नियुक्ति से जुड़े विवाद पर निर्णय दिया था, जिसकी वैधता को चुनौती देते हुए मामला अदालत पहुंचा था।
कालभैरव पर वंश परंपरा का दावा साबित नहीं
अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर पाया कि 1954 में पन्नालाल रिकॉर्डेड पुजारी थे और उस समय पद रिक्त नहीं था। वादी पक्ष अपने पूर्वजों की वंश परंपरा के पर्याप्त साक्ष्य पेश करने में असमर्थ रहा।
सिद्धवट और सिद्धेश्वर में अधिकार बरकरार
अदालत ने 4 जून 2012 के राजीनामा आवेदन और 4 सितंबर 2012 के आदेश को आधार मानते हुए कहा कि दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते के तहत वादी पक्ष के पूजा-अर्चना, नैवेद्य और व्यवस्था से जुड़े अधिकार सुरक्षित हैं।
80 बीघा कृषि भूमि का मामला
ग्राम भैसखेड़ी स्थित 80 बीघा 9 बिस्वा भूमि को लेकर भी सुनवाई हुई, जो सिद्धवट मंदिर से संबंधित बताई गई थी। पर्याप्त प्रमाणों के अभाव में अदालत ने इससे जुड़े कई दावों को अप्रमाणित माना।
विशेष हर्जाने की मांग खारिज
दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे पर 5-5 हजार के विशेष हर्जाने की मांग की गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि मामला हाईकोर्ट के निर्देशानुसार सिविल कोर्ट में आया था, इसलिए हर्जाना नहीं बनता। दोनों पक्षों को अपना-अपना वाद व्यय स्वयं वहन करने का आदेश दिया गया।