नेपाल में बिना भारी बारिश आई ‘डर्ट सुनामी’: ग्लेशियर टूटने से मचा सैलाब, 580 के करीब मौतें; 320 भारतीय संपर्क से बाहर

काठमांडू/नई दिल्ली। नेपाल-तिब्बत सीमा पर बुधवार सुबह आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। इस आपदा में अब तक करीब 580 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,000 से ज्यादा लोग लापता हैं। राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।
बाढ़ की चपेट में भारतीय नागरिक और कैलाश मानसरोवर यात्री भी आए हैं। विदेश मंत्रालय के मुताबिक, 320 भारतीयों से अभी संपर्क नहीं हो पा रहा है, जबकि 84 भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। तिब्बत की तरफ फंसे करीब 400 भारतीयों के सुरक्षित होने की भी जानकारी है।
आखिर बिना भारी बारिश के नेपाल में इतनी बड़ी ‘डर्ट सुनामी’ कैसे आई? ग्लेशियर टूटने से लेकर सैलाब आने तक की पूरी कहानी आसान भाषा में समझिए।
बिना भारी बारिश के कैसे आई ‘डर्ट सुनामी’?
बुधवार को तिब्बत बॉर्डर के पास लांगटांग नेशनल पार्क के इलाके में ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा अचानक टूट गया। यह करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर हुआ। ग्लेशियर के साथ भारी चट्टानें और बर्फ भी नीचे गिरने लगीं। इसे आइस-रॉक एवलांच कहा जाता है।
ग्लेशियर और चट्टानों का मलबा करीब 3,900 फीट नीचे घाटी में जा गिरा। मलबे ने ल्हेंदे खोला नदी का रास्ता रोक दिया। पानी आगे नहीं जा सका और पीछे जमा होने लगा। कुछ ही समय में पत्थर और मिट्टी से वहां एक अस्थायी बांध बन गया।

दबाव बढ़ा और बांध टूट गया
अस्थायी बांध के पीछे लगातार पानी जमा हो रहा था। पानी का दबाव बढ़ने के बाद बांध टूट गया। इसके बाद करीब 200 करोड़ लीटर पानी तेजी से नीचे की ओर बहा। पानी अपने साथ मिट्टी, पेड़ और बड़े पत्थर भी ले गया।
सैलाब भोटेकोशी और त्रिशूली नदी की घाटी की ओर तेजी से बढ़ा। रिपोर्टों के मुताबिक, करीब 30 मिनट के अंदर कुछ इलाकों में नदी का जलस्तर 30 फीट तक बढ़ गया। तेज बहाव और मलबे की वजह से लोगों को सुरक्षित जगह पहुंचने का बहुत कम समय मिला।

सैलाब ने रास्ते में आने वाले कई पुलों और सड़कों को नुकसान पहुंचाया।
- कम से कम 19 पुल बह गए ।
- करीब 40 किलोमीटर सड़कें प्रभावित हुईं।
- भारत-नेपाल सीमा का फ्रेंडशिप ब्रिज भी क्षतिग्रस्त हुआ।
सुरंग में फंसे 350 लोगों को बचाया
बाढ़ के दौरान करीब 350 मजदूर और स्थानीय लोग एक सुरंग में फंस गए थे। यह सुरंग अपर त्रिशूली जलविद्युत परियोजना से जुड़ी थी। नेपाली सेना ने रेस्क्यू ऑपरेशन चलाकर सभी को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
बचाव अभियान में ड्रोन, हेलीकॉप्टर और स्निफर डॉग्स की मदद ली जा रही है। कई जगह तेज पानी और सड़क पर जमा कीचड़ के कारण रेस्क्यू टीमों को परेशानी हो रही है।

320 भारतीयों से संपर्क नहीं
नेपाल में फंसे भारतीयों को लेकर भारत सरकार लगातार जानकारी जुटा रही है। 320 भारतीय नागरिक अभी संपर्क से बाहर हैं। इनमें कैलाश मानसरोवर यात्रा पर गए लोग, पर्यटक और कुछ कामगार शामिल हैं। वहीं, 84 भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इनमें तमिलनाडु के कैलाश मानसरोवर यात्रियों का एक समूह भी शामिल है।
कैलाश मानसरोवर यात्रियों की जान बची
तमिलनाडु के 21 कैलाश मानसरोवर यात्रियों को सुरक्षित निकाल लिया गया है।
एक यात्री ने बताया, “हम तीन बसों में सीमा की ओर जा रहे थे। अचानक तेज रफ्तार में कीचड़ और मलबा हमारी तरफ आने लगा। हम डर गए और तुरंत बस से उतरकर पहाड़ी की ओर भागे। देखते ही देखते हमारी दो बसें बाढ़ में बह गईं। नेपाली सेना ने हमें हेलिकॉप्टर से काठमांडू पहुंचाया। इसके बाद भारतीय दूतावास ने दिल्ली और फिर चेन्नई पहुंचने की व्यवस्था की।”
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सुरक्षित लौटे यात्रियों से मुलाकात की। उन्होंने नेपाली सेना के रेस्क्यू ऑपरेशन की सराहना की।

भारत ने भेजी राहत सामग्री
नेपाल में राहत और बचाव के लिए भारत ने मदद बढ़ा दी है। भारतीय वायुसेना के विमानों से अब तक 47.5 टन से ज्यादा राहत सामग्री और जरूरी दवाएं नेपाल भेजी गई हैं।
भारत ने NDRF की टीम, मेडिकल टीम और सुरंग से रेस्क्यू करने वाले विशेषज्ञ भी नेपाल भेजे हैं। टूटे रास्तों और पुलों को जल्द चालू करने के लिए बेली ब्रिज भी भेजे गए हैं।

तिब्बत की तरफ 400 भारतीय सुरक्षित
तिब्बत की तरफ करीब 400 भारतीय नागरिक फंसे हुए हैं। सभी के सुरक्षित होने की जानकारी है। इनमें से कई लोगों ने भारत से सुरक्षित निकासी के लिए मदद मांगी है। भारतीय दूतावास चीनी अधिकारियों के संपर्क में है। अब तक 96 भारतीय जमीन के रास्ते तिब्बत से नेपाल पहुंच चुके हैं।
क्या भूकंप की वजह से आई आपदा?
शुरुआत में इस घटना को 4.4 तीव्रता के भूकंप से जोड़ा गया था। बाद में इस दावे पर सवाल उठे। रिपोर्टों के मुताबिक, कोई बड़ा भूकंप नहीं आया था। ग्लेशियर और चट्टानों के गिरने से पैदा हुए कंपन को भूकंप समझ लिया गया था।
क्या क्लाइमेट चेंज भी वजह है?
वैज्ञानिक इस घटना को हिमालय में बदलते मौसम से भी जोड़कर देख रहे हैं। ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे ग्लेशियर और पहाड़ों की संरचना कमजोर हो सकती है। ऐसे में ग्लेशियर टूटने और अचानक बड़े सैलाब आने का खतरा बढ़ सकता है।
नेपाल की ‘डर्ट सुनामी’ ने क्या दिखाया?
इस घटना ने बताया कि पहाड़ी इलाकों में आपदा सिर्फ भारी बारिश से नहीं आती। ग्लेशियर टूटना, चट्टानों का गिरना और अचानक मलबे का बहाव भी बड़े सैलाब की वजह बन सकता है। यही वजह है कि हिमालयी इलाकों में ऐसी घटनाओं की निगरानी और समय रहते चेतावनी देना बेहद जरूरी है।