लद्दाख में बुद्ध अवशेषों की ऐतिहासिक प्रदर्शनी शुरू, अमित शाह बोले—आज और प्रासंगिक है बुद्ध का संदेश

लद्दाख के लेह में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर भगवान गौतम बुद्ध के पवित्र अवशेषों की पहली राष्ट्रीय प्रदर्शनी का भव्य शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर अमित शाह ने कहा कि आज के वैश्विक परिदृश्य में बुद्ध का शांति, करुणा और सहअस्तित्व का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक हो गया है।
लेह के जीवेत्सल मैदान में आयोजित इस कार्यक्रम में केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि 75 वर्षों बाद इन पवित्र अवशेषों का लद्दाख आगमन एक ऐतिहासिक और सौभाग्यपूर्ण क्षण है, जो मानवता को मध्यम मार्ग और शांति का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि भारत की सभ्यता हजारों वर्षों से ज्ञान और करुणा पर आधारित रही है।
कार्यक्रम में लद्दाख के उपराज्यपाल वीके सक्सेना सहित बौद्ध समुदाय के कई प्रमुख धार्मिक नेता और आध्यात्मिक गुरु उपस्थित रहे। आयोजन के दौरान पारंपरिक लामा वादन, दीप प्रज्वलन, त्सोग अर्पण और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से लद्दाख की समृद्ध परंपरा की झलक देखने को मिली।
अमित शाह ने अपने संबोधन में बताया कि 563 ईसा पूर्व लुंबिनी में सिद्धार्थ का जन्म हुआ, ज्ञान प्राप्ति के बाद वे बुद्ध कहलाए और 80 वर्ष की आयु में कुशीनगर में उनका महापरिनिर्वाण हुआ। उन्होंने कहा कि यह अद्भुत संयोग है कि बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और निर्वाण एक ही दिन हुआ, जो उनके जीवन को और विशेष बनाता है।
उन्होंने कहा कि लद्दाख सदियों से बौद्ध संस्कृति का केंद्र रहा है, जहां बुद्ध के धम्म का संरक्षण और संवर्धन होता रहा है। दलाई लामा भी इस क्षेत्र को करुणा और बौद्ध परंपरा की जीवंत भूमि बताते हैं।
गृहमंत्री ने कहा कि निंगमा, काग्यू, साक्य और गेलुग जैसी बौद्ध परंपराएं हमें वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में देखने की सीख देती हैं, जो वर्तमान वैश्विक अस्थिरता के दौर में बेहद महत्वपूर्ण है।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि ये पवित्र अवशेष 1 मई से 10 मई तक लेह के जीवेत्सल में सार्वजनिक दर्शन के लिए उपलब्ध रहेंगे। इसके बाद इन्हें जांस्कर और अन्य स्थानों पर भी प्रदर्शित किया जाएगा, जबकि 15 मई को इन्हें वापस नई दिल्ली लाया जाएगा, जहां ये राष्ट्रीय संग्रहालय में संरक्षित हैं।
इन अवशेषों का संबंध कपिलवस्तु के पिपरहवा स्तूप से माना जाता है, जिन्हें 1898 में खुदाई के दौरान खोजा गया था। बौद्ध अनुयायियों के लिए यह अत्यंत पवित्र माने जाते हैं और इन्हें बुद्ध के जीवित स्वरूप के रूप में श्रद्धा के साथ देखा जाता है।
यह प्रदर्शनी न केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक जुड़ाव का संदेश देने वाला एक प्रमुख आयोजन भी माना जा रहा है।






