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उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन बोले – भारत की आध्यात्मिक यात्रा में जैन दर्शन का योगदान अतुलनीय

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि भारत की आध्यात्मिक यात्रा, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मूल्य प्रणाली में जैन दर्शन का योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण रहा है। वे कर्नाटक के हासन ज़िले के श्रवणबेलगोला में जैन संत आचार्य शांति सागर महाराज की स्मृति में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे।

अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति ने कहा कि अहिंसा, संयम, करुणा और त्याग जैसे जैन धर्म के सिद्धांत भारतीय समाज के आध्यात्मिक लोकाचार को दिशा देते हैं। उन्होंने कहा कि जैन धर्म ने केवल धार्मिक विचारों में ही नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, साहित्य और नैतिक जीवनशैली में भी गहरा प्रभाव छोड़ा है।

श्री राधाकृष्णन ने बताया कि जैन मुनियों और विद्वानों ने तमिल साहित्य, दर्शन और भाषा के क्षेत्र में अमूल्य योगदान दिया है, जिससे भारतीय भाषाओं की समृद्ध परंपरा को सशक्त आधार मिला। उन्होंने आचार्य शांति सागर महाराज के तप, त्याग और आत्मशांति के जीवन को आधुनिक समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया। उपराष्ट्रपति ने कहा कि आंतरिक शांति और मोक्ष की खोज, मानव जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए, जैसा कि जैन परंपरा सिखाती है।

अपने वक्तव्य में उपराष्ट्रपति ने यह भी उल्लेख किया कि सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य ने भी भौतिक सुखों का त्याग कर अपने जीवन के अंतिम वर्ष श्रवणबेलगोला में बिताए थे, जो इस स्थल की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाता है।

कार्यक्रम के दौरान श्री राधाकृष्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार व्यक्त किया कि उन्होंने प्राकृत भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने और जैन धर्म से संबंधित सभी धार्मिक लिपियों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने के लिए विशेष अभियान शुरू किया है। उन्होंने कहा कि यह प्रयास न केवल जैन संस्कृति को सुरक्षित रखने में मदद करेगा बल्कि भावी पीढ़ियों को अपनी आध्यात्मिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम बनेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की आध्यात्मिक विविधता में जैन दर्शन का स्थान अनूठा है। इसकी शिक्षाएँ — सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह — आज भी समाज में सहअस्तित्व और शांति की भावना को प्रोत्साहित करती हैं।

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