महाशिवरात्रि के बाद पशुपतिनाथ मंदिर से भारत से आए साधु-संन्यासियों की विदाई

महाशिवरात्रि 2026 के अवसर पर नेपाल के प्रसिद्ध Pashupatinath Temple में पहुंचे भारत सहित विभिन्न देशों के नागा बाबा और साधु-संन्यासियों की मंगलवार को विधिवत भेंट और दान देकर विदाई की गई।
गुठी संस्थान ने इस विदाई कार्यक्रम के लिए लगभग 30 लाख नेपाली रुपये का बजट निर्धारित किया था। मंदिर ट्रस्ट के अनुसार, नेपाल के बाहर से आए 4,000 से अधिक साधुओं को विभिन्न अखाड़ों और मठों में ठहराया गया था।
अलग-अलग स्थानों पर ठहराए गए साधु
ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष श्रीधर सापकोटा ने बताया कि साधुओं को गोरखनाथ मठ, आर्यघाट के पार रामचंद्र मंदिर, भस्मेश्वर अखाड़ा और निर्मला अखाड़ा सहित विभिन्न स्थलों पर ठहराया गया था। आगमन के समय साधुओं को रंगों के आधार पर पहचान कार्ड दिए गए थे, जिनके अनुसार दान राशि वितरित की गई।
नेपाल से बाहर से आए साधुओं को सीमा तक यात्रा सुविधा के लिए अतिरिक्त सहायता भी प्रदान की गई।
1775 से चली आ रही परंपरा
गुठी संस्थान के पूर्व उप-प्रशासक दीपक बहादुर पाण्डे के अनुसार, साधुओं की औपचारिक विदाई की परंपरा वर्ष 1775 से चली आ रही है। उस समय जगत जंग ने जगन्नाथ प्रकाशेश्वर गुठी की स्थापना की थी। वर्तमान में यह परंपरा गुठी संस्थान और पशुपति क्षेत्र विकास ट्रस्ट द्वारा निभाई जा रही है।
पहले साधुओं को थापाथली के कलमोचन घाट से भोजन कराकर विदा किया जाता था। मान्यता थी कि इस स्थल से विदाई देने पर दिवंगत आत्माओं को शांति मिलती है। अब यह परंपरा बंद कर दी गई है और साधुओं को मंदिर के पश्चिमी मुख्य द्वार से विदा किया जाता है।
लकड़ी और दान की विशेष व्यवस्था
मंदिर परिसर के भीतर पांच दिन और बाहर चार दिन तक धूनी जलाने के लिए लगभग 50,000 किलोग्राम लकड़ी खरीदी गई, जिस पर करीब 7 लाख रुपये खर्च हुए।
ट्रस्ट की कार्यकारी सदस्य शीला पंत के अनुसार, साधुओं को उनकी श्रेणी के आधार पर 101 से 5,001 नेपाली रुपये तक दान दिया गया। इसके लिए 8 लाख रुपये का प्रावधान किया गया था। इसके अलावा, वर्ष भर मंदिर में अर्पित की गई रुद्राक्ष मालाएं भी साधुओं को प्रदान की जाएंगी।
श्रद्धा और परंपरा का संगम
महाशिवरात्रि के दौरान पशुपतिनाथ मंदिर में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी। साधु-संन्यासियों की उपस्थिति ने पर्व की आध्यात्मिक गरिमा को और बढ़ाया। परंपरागत सम्मान और दान के साथ उनकी विदाई नेपाल की धार्मिक संस्कृति और सदियों पुरानी आस्था का प्रतीक मानी जाती है।






