मनुस्मृति के कुछ हिस्से ब्रिटिश काल में संपादित होने की आशंका, मूल पांडुलिपियों की जांच की मांग

प्राचीन धर्मग्रंथ Manusmriti को लेकर एक बार फिर बहस तेज होती दिखाई दे रही है। कुछ विद्वानों का दावा है कि आज प्रचलित मनुस्मृति के कई हिस्से संभवतः ब्रिटिश शासनकाल के दौरान संपादित या प्रक्षेपित किए गए हो सकते हैं। इस संदर्भ में Indian Institute of Mass Communication के प्रोफेसर Rakesh Upadhyay ने मूल पांडुलिपियों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की दोबारा जांच कराने की मांग उठाई है।
प्रो. राकेश उपाध्याय का कहना है कि मनुस्मृति के संदर्भ में यह जानना जितना जरूरी है कि इसे कब लिखा गया, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि समय-समय पर इसमें कब और कैसे संशोधन या प्रक्षेपण हुए। ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार मनुस्मृति का पहला मुद्रित संस्करण ब्रिटिश शासनकाल में प्रिंटिंग प्रेस के माध्यम से प्रकाशित किया गया था।
बताया जाता है कि 18वीं सदी में ब्रिटिश अधिकारियों के निर्देश पर हिंदू समाज के लिए विधि-संहिता तैयार करने के उद्देश्य से विभिन्न पांडुलिपियों को एकत्र कर उनका संपादन और प्रकाशन कराया गया था। इसी प्रक्रिया के दौरान अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त अंशों को जोड़कर ग्रंथ तैयार किए जाने की संभावना भी जताई जाती है। विद्वानों का कहना है कि संभवतः इसी कारण मनुस्मृति में कुछ विरोधाभासी श्लोक भी देखने को मिलते हैं।
इस पूरे विषय पर गहन शोध की मांग करते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि देशभर के प्राचीन मठों, पुस्तकालयों और राजघरानों में संरक्षित पांडुलिपियों की खोज कर उनका वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाना चाहिए। इससे मनुस्मृति के मूल स्वरूप और वर्तमान संस्करण के बीच संभावित अंतर को समझने में मदद मिल सकती है।
प्रो. राकेश उपाध्याय का कहना है कि इतिहास, संस्कृति और धर्म से जुड़े विषयों पर बिना प्रमाण के निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। इसलिए उन्होंने केंद्र सरकार और संबंधित शोध संस्थानों से इस विषय पर पारदर्शी और व्यापक शोध परियोजना शुरू करने का आग्रह किया है, ताकि मनुस्मृति के मूल स्वरूप को लेकर उठ रहे सवालों का स्पष्ट उत्तर मिल सके।






