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‘कश्मीर में आज भी धर्म पूछकर मारते हैं गोली’: इंदौर में राजेश रैना ने सुनाई मातृभूमि छोड़ने की कहानी; कहा-मदद में सरकार दी थी एक कंबल

इंदौर। ‘कश्मीर आज भी सुरक्षित नहीं है। वहां आज भी आतंकवाद है। धर्म पूछकर गोली मार दी जाती है। विस्थापन के समय सरकार की ओर से मदद के नाम पर केवल 9 किलो चावल। 2 किलो चीनी। एक कंबल मिला था।

मेरे पिता कश्मीर में शिक्षक थे। जब हमें घर छोड़ना पड़ा तो स्थिति ऐसी हुई कि पिता जी के पास कोई काम नहीं बचा। जीरो से शुरुआत करना काफी कठिन था।‘

ये कहानी DAVV के SJMC के सेमिनार हाल में वरिष्ठ पत्रकार राजेश रैना ने पत्रकारिता के छात्रों को सुनाई। कहानी सुनाते-सुनाते वो भावुक हो गए। लगभग 2 मिनट तक सन्नाटा छा गया।

सभी 20 जनवरी 1990 के दौर को याद करने लगे। तब रैना बोले-पत्रकारिता की राह आसान नहीं है। हमने तो 12वीं कश्मीर में की लेकिन बाद में जम्मू आए और यहां से BSC की पढ़ाई की।

पहले पढ़िए छात्रों के सवाल और वरिष्ठ पत्रकार राजेश रैना के जबाव…।

सवाल: पवन शर्मा ने पूछा- सर क्या अभी भी कश्मीरी पंडित वापस कश्मीर जा सकते हैं।
जवाब:  हां….। जा सकते हैं। जाने में कोई दिक्कत नहीं है। लेकिन सुरक्षित नहीं हैं। क्योंकि वहां आतंकवाद सक्रिय है। हालात ये हैं कि आज भी धर्म पूछ कर गोली मार दी जाती है।

सवाल:
आशमा बागरी ने पूछा- आरक्षण हटाने के लिए युवा सक्रिय हो रहे हैं। इंस्टाग्राम पर यूजर ID के फॉलोवर्स मिलियन में हैं। CJP की तरह ये बदलाव ला सकते हैं।
जवाब: आरक्षण जाति देखकर नहीं हर वर्ग को जरूरत के हिसाब से मिलना चाहिए।

सवाल: यशस्विनी फडनिस- पत्रकारिता के नए छात्रों के लिए आपकी राय क्या है।
जवाब: मैं कहता हूं कि आपको पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि नए बच्चों को शॉर्टकट पसंद है। पत्रकारिता में शॉर्ट नहीं होता। फील्ड में उतरना पड़ता है। खबर की डेफ्थ में जाना पड़ता है। अगर आप संघर्ष कर सकते हैं तभी पत्रकारिता करें…।

सवाल:
नमन कटारे- झारखंड में प्रदर्शन चल रहा। क्या हेमंत सोरेन को इस्तीफा दे देना चाहिए।
जवाब: अगर प्रतिदिन प्रदर्शन करके इस्तीफा मांगा जाएगा तो क्या सरकार इस्तीफा ही देती रहेगी।

नौकरी के बाद की पत्रकारिता की पढ़ाई
राजेश रैना को शुरुआत में दूरदर्शन में उर्दू कंटेट राइटर का काम मिला। जब काम के जरिए लोग पहचानने लगे तब उलको महसूस हुआ कि पत्रकारिता की डिग्री होनी चाहिए। इसके बाद उन्होंने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की और पत्रकारिता को फुल-टाइम करियर बना लिया।

आज की Gen-Z को शार्टकट पसंद
छात्रों के साथ सवाल-जबाव में उन्होंने कहा- पत्रकारिता शॉर्टकट से नहीं फील्ड के अनुभव से सीखी जाती है। लेकिन अब जेन-जी का दौर है। ऐसे में बच्चे फोन नहीं छोड़ पा रहे हैं। बदलते दौर में मीडिया की चुनौतियां बढ़ी हैं। तेजी से बदलती तकनीक। AI की चुनौती। करियर, डिजिटल मीडिया का भविष्य और फेक न्यूज जो पहचान गया वही असली पत्रकार है। सेमिनार में विभागाध्यक्ष डॉ. सोनाली सिंह नरगुंदे, प्रोफेसर मनीष काले, अनुराधा शर्मा सहित अन्य प्रोफेसर और पत्रकारिता विभाग के स्टूडेंट उपस्थित रहे।

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