राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी को जाति प्रमाण पत्र मामले में क्लीन चिट, दो साल की जांच के बाद शिकायत खारिज
मध्यप्रदेश की राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठे थे। कांग्रेस नेता प्रदीप अहिरवार ने शिकायत दर्ज कराई थी। मामला हाईकोर्ट जबलपुर तक पहुंचा था। उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने दो साल जांच की। समिति ने मंत्री के जाति प्रमाण पत्र को वैध ठहराते हुई क्लीन चिट दे दी है।
यह था पूरा विवाद का मामला
प्रतिमा बागरी सतना जिले की रैगांव विधानसभा सीट से विधायक हैं। वे राज्य सरकार में नगरीय विकास एवं आवास विभाग की राज्यमंत्री भी हैं। उनका जाति प्रमाण पत्र अनुसूचित जाति की “बागरी” श्रेणी में दर्ज है। यह प्रमाण पत्र उन्हें अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व, नागौद ने जारी किया था। इसी प्रमाण पत्र पर सवाल खड़ा हुआ। आरोप था कि यह फर्जी दस्तावेजों के आधार पर बनवाया गया। शिकायत में कहा गया कि मंत्री असल में अनुसूचित जाति की नहीं हैं।
शिकायतकर्ता का नाम प्रदीप अहिरवार है। वे कांग्रेस की अनुसूचित जाति शाखा के प्रदेश अध्यक्ष बताए जाते हैं। उन्होंने 31 मार्च 2025 को अनुविभागीय अधिकारी को शिकायत दी थी। शिकायत में मंत्री पर फर्जी दस्तावेज से प्रमाण पत्र बनवाने का आरोप लगाया गया था। उन्होंने इसके समर्थन में शपथपत्र भी प्रस्तुत किया था।
हाईकोर्ट ने आदेश जारी किया
जांच में देरी होने पर शिकायतकर्ता जबलपुर हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने याचिका क्रमांक 8658/2026 दायर की थी। हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल 2026 को आदेश दिया। कोर्ट ने समिति को 60 दिन के भीतर फैसला लेने को कहा। इसी आदेश के बाद जांच में तेजी आई।
समिति ने कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और तहसीलदार से जांच रिपोर्ट मंगवाई। राजस्व रिकॉर्ड वर्ष 1916-17 से खंगाले गए। इनमें मंत्री के पूर्वजों की जाति “बागरी” दर्ज मिली। उनके पिता और दादा के शिक्षा दस्तावेजों में भी यही जाति लिखी पाई गई। जांच में यह भी सामने आया कि परिवार सतना जिले का मूल निवासी है। पुलिस जांच में भी परिवार की जाति को लेकर कोई गड़बड़ी नहीं मिली। गांव के बुजुर्गों के बयान भी दर्ज किए गए। सभी ने परिवार को “बागरी” जाति का बताया।
परिवार का इतिहास
मंत्री के दादा जीवनदास बागरी और परदादा रामगोपाल बागरी थे। दोनों के नाम पुराने राजस्व अभिलेखों में जाति “बागरी” के साथ दर्ज हैं। परिवार पहले वसुधा गांव में रहता था। बाद में यह हरदुआ मझोल गांव में बस गया। परिवार का मुख्य पेशा खेती और मजदूरी रहा है।
समिति का फैसला
समिति ने दोनों पक्षों को 6 जुलाई 2026 की बैठक में सुना। मंत्री और शिकायतकर्ता दोनों उपस्थित रहे। दोनों ने अपने-अपने दस्तावेज पेश किए। गहन समीक्षा के बाद समिति ने 14 जुलाई 2026 को फैसला सुनाया। समिति ने मंत्री के जाति प्रमाण पत्र को पूरी तरह वैध माना। शिकायतकर्ता की आपत्ति को खारिज कर दिया गया। इस फैसले पर मध्यप्रदेश के प्रमुख सचिव अनुसूचित जाति कल्याण विभाग की अध्यक्षता वाली समिति ने हस्ताक्षर किए। समिति में राज्य अनुसूचित जाति आयोग के सचिव और आयुक्त अनुसूचित जाति विकास भी शामिल थे।