300 साल बाद बने दुर्लभ महासंयोग ; अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित
सोमवती अमावस्या पर 300 साल बाद बन बन रहे दुर्लभ योग। गीता में भी भगवान कृष्ण ने पीपल का विशेष महत्व बताया हैं।
सोमवार को पड़ने वाली अमावस्या क्यों मानी जाती है बेहद शुभ?
अमावस्या तिथि पितरों को समर्पित होती है और जब यह सोमवार के दिन पड़ती है तो इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है। इस दिन पितरों के नाम से तर्पण, श्राद्ध और दान करने से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। जेठ माह की अमावस्या पर किया गया तर्पण विशेष फलदायी माना जाता है। श्रद्धालु अपने पितरों की मुक्ति और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से गंगा तटों पर विधि-विधान से पूजा और तर्पण कर रहे हैं।
भगवान कृष्ण ने गीता में भी बताया है पीपल का महत्व
सोमवती अमावस्या के दिन पीपल के वृक्ष की पूजा का विशेष विधान है। श्रीमद्भगवद्गीता का उल्लेख है कि भगवान श्रीकृष्ण कहते है, “अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्” अर्थात सभी वृक्षों में मैं पीपल हूं। सनातन परंपरा में पीपल को देववृक्ष माना गया है और इसकी पूजा को अत्यंत शुभ और पुण्यदायी बताया गया है। पीपल केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बहुत जरूरी वृक्ष है। ऋषि-मुनियों ने प्रकृति संरक्षण और आध्यात्मिक चेतना को जोड़ते हुए इसकी पूजा की परंपरा स्थापित की थी। सोमवती अमावस्या पर पीपल के वृक्ष को जल अर्पित करना, उसका अभिषेक करना, दीपदान करना और उसकी परिक्रमा करना विशेष रूप से कल्याणकारी माना जाता है।
सोमवती अमावस्या का पुण्य
श्रद्धालु किसी कारणवश हरिद्वार या अन्य तीर्थ स्थलों तक नहीं पहुंच सकता है, तो वह घर पर स्नान के जल में गंगाजल मिलाकर स्नान कर सकते है। इसके बाद पितरों का स्मरण कर तर्पण, दान और प्रार्थना करनी भी चाहिए। सच्ची श्रद्धा और भक्ति के साथ किया गया पूजन भी उतना ही फलदायी माना जाता है जितना तीर्थ स्थलों पर किया गया अनुष्ठान। इसलिए श्रद्धालुओं को इस दिन धर्म, सेवा और सद्कर्म के कार्यों में भाग लेना चाहिए।
