नेपाल में संवैधानिक परिषद अध्यादेश को राष्ट्रपति की मंजूरी, कोरम और बहुमत पर स्पष्टता

रामचंद्र पौडेल ने संवैधानिक परिषद से संबंधित अध्यादेश को मंजूरी दे दी है, जिससे नेपाल की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है।
यह अध्यादेश सरकार की दोबारा सिफारिश के बाद पारित हुआ, जिसे पहले राष्ट्रपति ने पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया था। बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे बिना बदलाव के फिर से भेजा था।
नए प्रावधान के अनुसार, संवैधानिक परिषद की बैठक के लिए कम से कम चार सदस्यों की उपस्थिति आवश्यक होगी, जिसे कोरम माना जाएगा। इसके अलावा, उपस्थित सदस्यों के बहुमत से निर्णय लिया जा सकेगा।
संवैधानिक परिषद एक छह सदस्यीय निकाय है, जिसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री करते हैं। इसमें प्रमुख विपक्षी नेता, प्रधान न्यायाधीश, प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष शामिल होते हैं।
राष्ट्रपति ने पहले इस अध्यादेश पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि यह संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है, क्योंकि इसमें बहुमत प्रणाली की व्याख्या अलग तरीके से की गई थी। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया कि बैठक तभी संभव होगी जब सभी सदस्य पद पर हों, और केवल उपस्थिति के आधार पर कोरम तय किया जाएगा।
अध्यादेश में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि मतदान में बराबरी की स्थिति उत्पन्न होती है, तो परिषद के अध्यक्ष यानी प्रधानमंत्री का पक्ष निर्णायक माना जाएगा।
सरकार का कहना है कि यह कदम संवैधानिक प्रक्रियाओं को स्पष्ट और प्रभावी बनाने के लिए उठाया गया है, ताकि निर्णय लेने में गतिरोध की स्थिति से बचा जा सके।
यह घटनाक्रम नेपाल की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है और आने वाले समय में इसके प्रभाव पर नजर बनी रहेगी।






