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मोबाइल फोबिया: बढ़ता स्क्रीन टाइम बना मानसिक और शारीरिक बीमारियों का बड़ा खतरा

डॉ. रमेश ठाकुर। आधुनिक तकनीक ने जहां जीवन को आसान बनाया है, वहीं मोबाइल फोन की बढ़ती लत ने मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे भी खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक स्क्रीन टाइम लोगों को वास्तविक जीवन से दूर कर आभासी दुनिया में धकेल रहा है, जिससे नई प्रकार की बीमारियां जन्म ले रही हैं।

नई शोध रिपोर्टों के मुताबिक लंबे समय तक मोबाइल के इस्तेमाल से आंखों की रोशनी कमजोर होना, शारीरिक गतिविधियों में कमी, मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़े विकार, मोटापा और अन्य दीर्घकालिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। चिंताजनक बात यह है कि जिन देशों में यह समस्या सबसे गंभीर है, उनमें भारत भी शामिल है।

विशेषज्ञों ने स्मार्टफोन को सिरहाने रखकर सोने की आदत को बेहद खतरनाक बताया है। कई लोगों को ऐसा महसूस होता है कि उनका फोन वाइब्रेट कर रहा है, जबकि वास्तव में कोई कॉल या संदेश नहीं होता। इस स्थिति को Phantom Vibration Syndrome या Mobile Phobia कहा जाता है, जो एक नई मानसिक समस्या के रूप में उभर रही है। किशोर और युवा वर्ग, विशेषकर 14 से 17 वर्ष आयु समूह, इससे सबसे अधिक प्रभावित बताए जा रहे हैं।

रिपोर्ट में मोबाइल विकिरण से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों का भी उल्लेख किया गया है। कुछ अध्ययनों में गर्भवती महिलाओं और भ्रूण पर प्रतिकूल असर, हार्मोनल बदलाव तथा कैंसर के संभावित जोखिमों की जांच जारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन सहित कई वैश्विक संस्थाएं इस विषय पर विस्तृत अध्ययन कर रही हैं।

देशभर के अस्पतालों में हर साल लाखों लोग मोबाइल फोबिया से जुड़ी समस्याओं के कारण इलाज के लिए पहुंच रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय रहते सावधानी नहीं बरती गई तो यह समस्या भविष्य में बड़े जनस्वास्थ्य संकट का रूप ले सकती है।

मनोवैज्ञानिकों की सलाह है कि मोबाइल उपयोग का समय निर्धारित करें, सोने से पहले फोन से दूरी बनाए रखें, गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करें और खाली समय में पढ़ाई, व्यायाम या सामाजिक गतिविधियों में शामिल हों। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लेना भी जरूरी है। वयस्कों के लिए प्रतिदिन 2–3 घंटे और बच्चों के लिए लगभग 2 घंटे तक ही मोबाइल उपयोग सुरक्षित माना जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार मोबाइल फोबिया केवल एक बीमारी नहीं बल्कि चेतावनी है कि हमें तकनीक के संतुलित उपयोग की ओर लौटना होगा। आखिरकार यह तय हमें ही करना है कि हम मोबाइल का उपयोग करेंगे या मोबाइल हमें नियंत्रित करेगा।

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