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नेपाल के मिथिलांचल में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया वट सावित्री पर्व

नेपाल के मिथिलांचल और तराई-मधेश क्षेत्र में शनिवार को वट सावित्री पर्व श्रद्धा, भक्ति और पारंपरिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर सुहागिन महिलाओं ने पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान प्राप्ति की कामना के साथ व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की।

जेठ माह की अमावस्या तिथि पर मनाए जाने वाले इस विशेष धार्मिक पर्व के दौरान सुबह से ही गांवों और शहरों में बरगद (वट वृक्ष) के नीचे पूजा करने वाली महिलाओं की भारी भीड़ देखने को मिली। महिलाएं पारंपरिक परिधानों और सोलह श्रृंगार में पूजा स्थलों पर पहुंचीं और पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ व्रत अनुष्ठान संपन्न किया।

नेपाल के मिथिलांचल क्षेत्र में इस पर्व से जुड़ी एक खास परंपरा भी निभाई गई, जिसमें नवविवाहित महिलाओं को ससुराल पक्ष की ओर से पूजा सामग्री, वस्त्र और उपहार भेजे गए। स्थानीय भाषा में इन उपहारों को ‘पाहुर’ कहा जाता है, जो क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार बरगद का वृक्ष अत्यंत पवित्र माना जाता है। महिलाएं वट वृक्ष के चारों ओर कच्चा सूती धागा लपेटकर पूजा करती हैं और वट सावित्री कथा का श्रवण करती हैं। धार्मिक विश्वास है कि इस वृक्ष में देवताओं का वास होता है।

पौराणिक कथा के अनुसार माता सावित्री ने अपने अटूट सतीत्व, तपस्या और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। इसी स्मृति में वट सावित्री पर्व मनाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।

धार्मिक मान्यता है कि यह व्रत वैवाहिक जीवन में सुख, पति की लंबी आयु और संतान सुख का आशीर्वाद देता है। यही वजह है कि महिलाओं में इस पर्व को लेकर विशेष आस्था और उत्साह देखने को मिलता है।

समय के साथ अब यह पर्व केवल मिथिलांचल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नेपाल के अन्य समुदायों की महिलाएं भी इसे श्रद्धा और परंपरा के साथ मनाने लगी हैं। इससे वट सावित्री पर्व सामाजिक और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक बनता जा रहा है।

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