केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 7.6 के महत्व और जलवायु वित्त बढ़ाने की आवश्यकता पर दिया ज़ोर

ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-30 के दौरान भारत ने स्वच्छ ऊर्जा अनुकूलन पर वैश्विक बहस को मजबूती से आगे बढ़ाया। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने बाकू उच्च-स्तरीय संवाद में विकासशील देशों के सामने मौजूद वित्तीय बाधाओं और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण की चुनौतियों पर रोशनी डाली। उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुकूलन लक्ष्य बढ़ाने के लिए तत्काल वैश्विक वित्तीय सहयोग बढ़ाना आवश्यक है।
मंत्री यादव ने पेरिस समझौते की 10वीं वर्षगांठ के अवसर पर इसके अनुच्छेद 7.6 के महत्व को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि वर्ष 2025 की रिपोर्ट के अनुसार विकासशील देशों को 2035 तक स्वच्छ ऊर्जा उपायों के लिए सालाना 310 से 365 अरब डॉलर की आवश्यकता होगी, जबकि वर्तमान में उन्हें केवल लगभग 26 अरब डॉलर ही प्राप्त हो रहा है। यह अंतर वैश्विक जलवायु न्याय की आवश्यकता को दर्शाता है।
उन्होंने कहा कि पूर्व अनुमानित, अनुदान-आधारित और रियायती वित्तीय सहायता विकासशील देशों के लिए अत्यंत जरूरी है। ग्लासगो जलवायु समझौते के तहत 2025 तक सार्वजनिक अनुकूलन वित्त को लगभग 40 अरब डॉलर तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया था, परंतु मौजूदा स्थिति में इस लक्ष्य के पूरा होने की संभावना कम दिखाई देती है। मंत्री ने सुझाव दिया कि बाकू सम्मेलन से बेलेम भविष्य योजना में जलवायु वित्त योगदान को बढ़ाकर 1.3 ट्रिलियन डॉलर के स्तर तक पहुंचाने के लिए वैश्विक प्रयास तेज करने होंगे।
अपने संबोधन में मंत्री यादव ने भारत की प्रतिबद्धता को भी दोहराया। उन्होंने बताया कि भारत ने घरेलू संसाधनों के आधार पर राष्ट्रीय और राज्य-स्तरीय योजनाओं के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा अनुकूलन को लगातार बढ़ावा दिया है। 2016-17 से 2022-23 के बीच GDP के प्रतिशत के रूप में भारत का अनुकूलन-संबंधी व्यय 150 प्रतिशत तक बढ़ा है, जो देश की दीर्घकालिक रणनीति का संकेत है।
उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने संस्थागत क्षमता-निर्माण के माध्यम से जलवायु वित्त तक आसान पहुँच सुनिश्चित की है। भारत की यह रणनीति वैश्विक दक्षिण के अन्य देशों के लिए भी एक मॉडल के रूप में उभर रही है।





