इंदौर की हुकमचंद मिल के 380 श्रमिक परिवारों को नहीं मिला पैसा: 80 करोड़ से ज्यादा बकाया; 33 साल पहले बंद हुई थी

इंदौर। हुकमचंद मिल के 380 श्रमिक परिवारों को जमीन बिकने के दो साल बाद भी उनकी बकाया राशि का इंतजार है। इन परिवारों में श्रमिक और उनकी पत्नी दोनों की मौत हो चुकी है। एक से ज्यादा वारिस होने के कारण भुगतान अटक गया है। इन परिवारों की बकाया राशि 80 करोड़ से ज्यादा है।
चार हजार से ज्यादा श्रमिकों के खाते में गई राशि
हुकमचंद मिल की 41 एकड़ जमीन बिकने के बाद 380 करोड़ रुपए की राशि साढ़े चार हजार से ज्यादा श्रमिकों और उनके परिवारों के खातों में पहुंचाई गई थी। जिन श्रमिकों या उनकी पत्नी में से कोई जीवित था, उन्हें भुगतान में ज्यादा परेशानी नहीं हुई। ऐसे मामलों में तीन महीने के भीतर राशि का भुगतान कर दिया गया।
अभी तक नहीं हुआ भुगतान
श्रमिकों और उनकी पत्नी दोनों की मौत हो चुकी है और एक से ज्यादा वारिस हैं, उनके मामलों को कोर्ट ने थर्ड पार्टी वारिस की श्रेणी में माना है। हाईकोर्ट द्वारा गठित कमेटी ने इन परिवारों के आवेदनों का सत्यापन कर सूची लिक्विडेटर को सौंप दी है। इसके बावजूद अभी तक भुगतान नहीं हो पाया है।
वारिसों की आपत्तियों के बाद भुगतान में सावधानी
दरअसल, कुछ श्रमिकों के वारिसों ने आपत्ति दर्ज कराई कि वे भी कानूनी वारिस हैं और राशि उनके खाते में दी जाए। एक से ज्यादा दावेदार सामने आने के बाद कमेटी ने ऐसे मामलों में भुगतान रोककर दस्तावेजों और दावों की जांच का फैसला लिया। इसी वजह से 380 परिवारों का मामला लंबित है।
33 साल पहले बंद हुई थी हुकमचंद मिल
गौरतलब है कि हुकमचंद मिल 33 साल पहले अचानक बंद हो गई थी। इसके बाद हजारों श्रमिकों का पीएफ और अन्य भुगतान अटक गया था। श्रमिकों ने अपने हक के लिए लंबे समय तक हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ी। कोर्ट के निर्देश के बाद मिल की जमीन बेचकर श्रमिकों को भुगतान करने का रास्ता निकला। नगर निगम ने 41 एकड़ जमीन हाउसिंग बोर्ड को 400 करोड़ रुपए में बेची। इसके बाद श्रमिकों और उनके परिवारों के खातों में भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि, 380 परिवार अब भी अपनी बकाया राशि मिलने का इंतजार कर रहे हैं।