हिन्दी भवन में 31वीं पावस व्याख्यानमाला: समरसता को आचरण में उतारने पर जोर; पुस्तक और अक्षरा विशेषांक का लोकार्पण

भोपाल। मध्यप्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन न्यास, भोपाल की ओर से हिन्दी भवन के सारस्वत आयोजनों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए रविवार को 31वीं पावस व्याख्यानमाला-2026 का आयोजन किया गया।
पॉलिटेक्निक चौराहा स्थित हिन्दी भवन में सुबह 10 बजे से दोपहर 2:30 बजे तक चले आयोजन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विद्वानों ने साहित्य, सामाजिक समरसता, अध्यात्म और समकालीन सामाजिक सरोकारों पर विचार-विमर्श किया।
विधानसभा अध्यक्ष ने की उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता
कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता मध्यप्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने की। इस दौरान न्यायमूर्ति देवदत्त माधव धर्माधिकारी, पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय, भारत की पुस्तक ‘न्याय का अनकहा सफर’ का लोकार्पण किया गया।
इसी अवसर पर ‘अक्षरा’ का कैलाशचन्द्र पंत विशेषांक भी लोकार्पित हुआ। कार्यक्रम में नव श्रृंगारित ग्रंथालय का लोकार्पण और मुख्य सभागार का नामकरण भी किया गया। स्वागत उद्बोधन एवं प्रस्तावना डॉ. विकास दवे ने प्रस्तुत की।

आध्यात्मिक लेखन के साहित्यिक अवदान पर चर्चा
उद्घाटन सत्र में प्रो. पवन विजय, प्राध्यापक, इन्द्रप्रस्थ विश्वविद्यालय, दिल्ली ने आध्यात्मिक लेखन के साहित्यिक अवदान पर विचार व्यक्त किए। आभार रघुनंदन शर्मा ने माना तथा संचालन डॉ. संजय सक्सेना ने किया।
सामाजिक समरसता की प्रासंगिकता पर हुआ विमर्श
व्याख्यानमाला के समापन सत्र में ‘सामाजिक समरसता की प्रासंगिकता’ विषय पर विशेष विमर्श आयोजित हुआ। यह सत्र संत रविदास जी की 650वीं जयंती वर्ष के विशेष संदर्भ में केंद्रित रहा। सत्र की अध्यक्षता डॉ. देवेंद्र दीपक ने की।
मुख्य वक्ता डॉ. गुरुप्रकाश पासवान, पटना ने सामाजिक समरसता, समानता और संत रविदास की विचार-दृष्टि के समकालीन महत्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि समरसता केवल उद्बोधन का विषय नहीं, बल्कि आचरण का विषय है। आभार डॉ. विकास दवे ने व्यक्त किया तथा संचालन श्रीमती अनीता सक्सेना ने किया।

साहित्य के साथ सामाजिक विमर्श का मंच
31वीं पावस व्याख्यानमाला ने एक बार फिर यह रेखांकित किया कि हिन्दी भवन केवल साहित्यिक गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विमर्श का भी महत्वपूर्ण मंच है। आयोजन में साहित्यकारों, विद्वानों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों की सहभागिता रही। कार्यक्रम के अंत में सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के लिए सहभोज का आयोजन किया गया।