कच्चे तेल की कीमतों में उछाल से भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ा दबाव, महंगाई और ग्रोथ रेट पर खतरे के संकेत

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही तेजी से भारत की अर्थव्यवस्था पर गंभीर दबाव बनने लगा है। विशेषज्ञों के अनुसार भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, ऐसे में वैश्विक स्तर पर बढ़ती कीमतें सीधे देश के आर्थिक संकेतकों को प्रभावित कर रही हैं।
तेल की कीमतों में उछाल के कारण ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है, जबकि सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में कटौती के बावजूद आम उपभोक्ताओं को दी गई राहत सीमित साबित हो रही है। इसके चलते इंपोर्ट बिल में बढ़ोतरी हो रही है, जिससे करंट अकाउंट डेफिसिट और फिस्कल डेफिसिट पर दबाव बढ़ सकता है।
रेटिंग एजेंसियों और अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में यह बढ़ोतरी भारतीय रुपये को और कमजोर कर सकती है, जिसका असर पहले ही विदेशी मुद्रा बाजार में देखने को मिल रहा है। रुपये में गिरावट से महंगाई बढ़ने की आशंका भी मजबूत हो गई है, क्योंकि आयातित वस्तुओं की लागत बढ़ जाती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो इसका असर निवेश, शेयर बाजार और आर्थिक विकास दर पर भी पड़ेगा। सरकार को आने वाले समय में सब्सिडी, मौद्रिक नीति और राजकोषीय रणनीति पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ सकते हैं।






