मंदिरों में क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा क्यों की जाती है? जानें अध्यात्म और विज्ञान की वजह

मंदिरों में घड़ी की सुई की दिशा में या क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा सिर्फ धार्मिक रीति नहीं बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी लाभकारी मानी जाती है।

मंदिर का गर्भगृह एक शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र होता है। क्लॉकवाइज परिक्रमा करने से व्यक्ति पृथ्वी और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के प्राकृतिक प्रवाह के अनुरूप अपने आप को संरेखित करता है। इससे मानसिक शांति, शारीरिक स्फूर्ति और आत्मिक विकास होता है।

ईशा फाउंडेशन के संस्थापक सदगुरु जगदीश वासुदेव के अनुसार, उत्तरी गोलार्ध में प्रदक्षिणा घड़ी की सुई की दिशा में ही करनी चाहिए, क्योंकि यह पृथ्वी की ऊर्जा प्रवाह के अनुकूल है। उन्होंने इसे नल के पानी के घूमने के उदाहरण से समझाया।

धर्म शास्त्रों के अनुसार, गीले कपड़े पहनकर प्रदक्षिणा करने से ऊर्जा ग्रहण करने की क्षमता बढ़ जाती है। पुराने समय में मंदिरों में कल्याणी या जल कुंड में स्नान के बाद गीले कपड़ों में प्रदक्षिणा की जाती थी।

मंदिरों में देवताओं के अनुसार परिक्रमा की संख्या भी अलग होती है। जैसे गणेश जी की तीन बार, विष्णु जी की चार बार, देवी दुर्गा की एक बार और शिव जी की आधी परिक्रमा। ये नियम ऊर्जा संतुलन और भक्ति के अनुसार बनाए गए हैं।

इस तरह क्लॉकवाइज प्रदक्षिणा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि शरीर और मन को सकारात्मक ऊर्जा से भरने का वैज्ञानिक तरीका भी है।

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